लुप्त संस्कार – नैतिकता
खरीदो तेल, घी, खोवा, मिलावट ही मिलावट है।
प्लास्टिक फूल – पौधों से, सजावट ही सजावट है।
जाम का झाम सड़कों पर, कहीं जाना हुआ दूभर,
बड़े गड्ढे, कहीं टक्कर, रुकावट ही रुकावट है।
रातदिन दौड़ – भागी है, काम का बोझ भी सिर पर,
सुबह से शाम तक खटना,थकावट ही थकावट है।
न वर्षा है, न छाया है, न चलती है हवा ठण्डी,
धो रहे कार,घर ,गलियाँ,तरावट ही तरावट है।
न घर में भाँग भूजीं है,जुगत से चल रही रोजी,
मोबाइल हाथ में महँगा,बनावट ही बनावट है।
हुई संतान आवारा, पिता – माता दुखी – बेबस,
लुप्त संस्कार – नैतिकता,गिरावट ही गिरावट है।
दिनोंदिन बढ़ रही संख्या,नए बनते मकानों की,
पड़ोसी कौन पहचाने, बसावट ही बसावट है।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
