मुक्तक
इज़्ज़त उछाली बाप की जिस प्यार के लिए
उसने ही तेरे जिस्म के टुकड़े कई किए
क़ुरआँ में जो लिखी नहीं बतला के बात वो
जो थे कलाम उनको भी अफ़ज़ल बना दिए
— त्रिशिका धरा
इज़्ज़त उछाली बाप की जिस प्यार के लिए
उसने ही तेरे जिस्म के टुकड़े कई किए
क़ुरआँ में जो लिखी नहीं बतला के बात वो
जो थे कलाम उनको भी अफ़ज़ल बना दिए
— त्रिशिका धरा