आज का सही प्रयास कल के मजबूत समाज का आधार बनेगा।
बच्चों की परवरिश महज उन्हें खाना खिलाने, कपड़े पहनाने या अच्छे स्कूल भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी आत्मा और व्यक्तित्व की गहन सिंचाई का एक व्यापक कार्य है। बच्चा जन्म के समय एक कोरे कागज़ की भाँति होता है, जिस पर माता-पिता, परिवार और आसपास का माहौल जो भी चित्र या संदेश अंकित कर देता है, वह जीवन भर उसके चरित्र में विद्यमान रहता है और उसके निर्णयों को प्रभावित करता रहता है। इसलिए, परवरिश एक ऐसी कला है जो न केवल बच्चे को मज़बूत बनाती है, बल्कि पूरे समाज की नींव को भी दृढ़ करती है। आइए, परवरिश के कुछ महत्वपूर्ण सूत्रों पर विस्तार से विचार करें।
हौसला बढ़ाना और आत्मविश्वास का निर्माण,,,
जिस बच्चे की छोटी-छोटी योग्यताओं और प्रयासों की सराहना की जाती है, उसके अंदर स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वास का बीज अंकुरित होता है। उदाहरण के लिए, अगर बच्चा पहली बार साइकिल चलाने की कोशिश करे और गिर जाए, तो माता-पिता कहें, “बहुत अच्छा प्रयास किया, अगली बार ज़रूर सफ़ल होगे,” तो वह हार मानने के बजाय और मेहनत करेगा। ऐसा बच्चा जीवन की कठिन चुनौतियों जैसे परीक्षा में असफ़लता या नौकरी में रुकावट,से घबराता नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करता है और सफ़लता प्राप्त करता है। इसके विपरीत, लगातार उपेक्षा से बच्चा असुरक्षित और हीनभावी हो जाता है।
नफ़रत बनाम मोहब्बत,,, सकारात्मक माहौल का महत्व,,,
अगर बच्चे को हर समय आलोचना, उपहास या गुस्से का सामना करना पड़े, जैसे “तू हमेशा फेल ही होगा” कहकर ताने मारना, तो वह धीरे-धीरे कायर, विद्रोही या झगड़ालू स्वभाव का हो जाता है। वह या तो खुद को बंद कर लेता है या आक्रामक होकर दूसरों पर हमला करता है। लेकिन जिस घर में प्रेम, दया और समझ का वातावरण हो,जहाँ गलतियों पर मारने के बजाय समझाया जाए और सफ़लताओं पर गले लगाया जाए,वहाँ बच्चा दूसरों के प्रति करुणा और सम्मान की भावना सीखता है। वह बड़ा होकर एक संवेदनशील और सहयोगी व्यक्ति बनता है, जो समाज में शांति और एकता का प्रतीक होता है।
ईमानदारी और न्याय चरित्र निर्माण की आधारशिला,,,
माता-पिता का चरित्र ही बच्चे का पहला और सबसे बड़ा स्कूल होता है। अगर घर में सच्चाई की शिक्षा दी जाए,जैसे छोटी चोरी या झूठ बोलने पर सजा न देकर सही रास्ता दिखाया जाए,और बच्चे के साथ निष्पक्ष व्यवहार हो, तो वह स्वाभाविक रूप से ईमानदार और न्यायप्रिय बनता है। उदाहरणस्वरूप, अगर भाई-बहनों में भेदभाव न हो और हर निर्णय तर्कसंगत हो, तो बच्चा समाज का एक न्यायपूर्ण और विश्वसनीय नागरिक बनकर उभरता है। यह गुण उसे उत्कृष्ट समाज का निर्माण करने में सक्षम बनाता है।
सख़्ती के प्रभाव, और हिंसा का उल्टा असर,,
मारपीट और कठोर सज़ा जैसी सख़्ती बच्चे के व्यक्तित्व को सुधारने के बजाय स्थायी रूप से बिगाड़ देती है। शोध बताते हैं कि ऐसी हिंसा से बच्चा आज्ञाकारी होने के बजाय ज़िद्दी, छलपूर्ण और झूठ बोलने वाला हो जाता है, क्योंकि वह डर से बचने के लिए छिप जाता है। इसके बजाय, शांतिपूर्ण अनुशासन जैसे नियमों की व्याख्या और परिणाम बताना बच्चे को ज़िम्मेदार बनाता है। लंबे समय में, हिंसा पीड़ित बच्चे अवसाद या आक्रामकता के शिकार हो सकते हैं, स्वयं को आदर्श बनाएँ।
अंत में, हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि बच्चे उपदेशों या नसीहतों से कम, बल्कि माता-पिता के दैनिक कार्यों और व्यवहार से अधिक सीखते हैं। अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे नैतिक मूल्यों से युक्त, आत्मविश्वासी और सफल इंसान बनें, तो हमें सबसे पहले ख़ुद को उनके लिए एक जीवंत उदाहरण (रोल मॉडल) बनाना होगा। आज का सही प्रयास कल के मजबूत समाज का आधार बनेगा।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
