वैश्विक शक्ति संतुलन और भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ कूटनीति
वैश्विक शक्ति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। शीत युद्ध की द्विध्रुवीयता से उभरी एकध्रुवीय व्यवस्था अब बहुध्रुवीयता की ओर अग्रसर है। अमेरिका की पारंपरिक प्रभुता को चीन के उदय, रूस के आक्रामक भू-राजनीतिक पुनरुत्थान, और विकासशील देशों की बढ़ती सामूहिक आवाज से चुनौती मिल रही है। इस बदलती विश्व व्यवस्था में भारत एक अद्भुत राजनयिक संतुलन-कला का प्रदर्शन कर रहा है जिसे ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ या बहु-संरेखण कूटनीति कहते हैं। यह नीति किसी एक महाशक्ति के खेमे में जाने से इनकार करते हुए सभी प्रमुख शक्तियों के साथ काम करने, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की क्षमता पर आधारित है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इसे ‘भारत का अपना दृष्टिकोण’ बताया है जो न तो अंधा अनुसरण है और न ही अलगाववाद।
भारत की यह बहु-संरेखण नीति शीत युद्ध की गुटनिरपेक्षता से अलग है। गुटनिरपेक्षता मूलतः दोनों महाशक्तियों से समान दूरी बनाए रखने की नीति थी, जबकि मल्टी-अलाइनमेंट सक्रिय रूप से सभी प्रमुख शक्तियों के साथ जुड़ाव का मार्ग है। इसे सबसे अच्छे तरीके से भारत की समकालीन कूटनीति में देखा जा सकता है। भारत एक ओर क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) में भागीदार है जो इंडो-पैसिफिक में नियम-आधारित व्यवस्था और चीन के प्रभाव को संतुलित करने का मंच है; वहीं दूसरी ओर भारत ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में भी सक्रिय है जहां चीन और रूस की केंद्रीय भूमिका है। सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तियानजिन में 25वें एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लिया — यह 2020 के गलवान घाटी टकराव के बाद उनकी पहली चीन यात्रा थी। इससे संकेत मिला कि भारत-चीन संबंध एक नए अध्याय में प्रवेश कर रहे हैं।
रूस के साथ भारत के संबंध इस बहु-संरेखण नीति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं। यूक्रेन संकट में भारत ने रूस की निंदा करने से परहेज किया और रूसी तेल की खरीद जारी रखी। इससे पश्चिम के साथ कुछ कूटनीतिक तनाव जरूर हुए, लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी। दिसंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली आए जो यूक्रेन संघर्ष के विस्तृत होने के बाद भारत की उनकी पहली यात्रा थी। इस यात्रा में दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा। व्यापार, ऊर्जा, अंतरिक्ष, सैन्य-तकनीकी सहयोग, विज्ञान-प्रौद्योगिकी सहित कई क्षेत्रों में समझौते हुए। भारत-रूस संबंधों की नींव 1971 की ‘शांति, मित्रता और सहयोग की संधि’ से बनी थी और दोनों देशों के बीच 2021-2031 के लिए सैन्य-तकनीकी सहयोग का एक समझौता भी है।
अमेरिका के साथ भारत के संबंध हमेशा सरल नहीं रहे। फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने वाशिंगटन का दौरा किया और शुल्क वार्ता में अनुकूल व्यवहार की उम्मीद थी। लेकिन अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50 प्रतिशत का शुल्क लगाया, जिसमें रूसी तेल खरीद के लिए एक अतिरिक्त 25 प्रतिशत का दंड शामिल था। चैथम हाउस के वरिष्ठ शोधकर्ता चिएतिगज बाजपाई के अनुसार अन्य देशों को इस तरह के शुल्क से बख्शा गया क्योंकि वे अमेरिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए रणनीतिक रूप से अपरिहार्य हैं या वे अमेरिकी सहयोगी हैं। भारत की समान दूरी की नीति को ‘दूर या अलग’ माना गया। 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान अमेरिका द्वारा मध्यस्थता का दावा भी नई दिल्ली को पसंद नहीं आया। हडसन इंस्टीट्यूट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के अप्रत्याशित रुख ने भारत को अपनी बहु-संरेखण नीति को और मजबूत करने के लिए प्रेरित किया।
चीन के साथ भारत के संबंध जटिल हैं लेकिन व्यावहारिकता पर आधारित हैं। जून 2020 की गलवान घाटी झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। इसके बावजूद भारत ने कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 99.2 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। 2025 की शुरुआत में चीन ने दुर्लभ मृदा खनिज, उर्वरक और टनल बोरिंग मशीनों की आपूर्ति सीमित की, जिससे ऑटोमोबाइल क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह अगस्त 2025 में फिर बहाल हुई। इस निर्भरता को कम करने के लिए भारत ने विविधीकरण की रणनीति अपनाई है। तियानजिन एससीओ यात्रा को भारत द्वारा रणनीतिक पुनर्संतुलन नहीं बल्कि व्यावहारिक राजनय का एक उदाहरण माना जाता है।
फ्रांस के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी बहु-संरेखण नीति का एक उज्ज्वल उदाहरण है। 2018-2022 के बीच भारत फ्रांस का सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा और फ्रांसीसी हथियार भारत के कुल आयात का करीब 30 प्रतिशत थे। फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की पेरिस यात्रा में 10.6 अरब यूरो का एक रक्षा सौदा हुआ जिसमें राफेल जेट और स्कॉर्पीन पनडुब्बियां शामिल थीं। द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2023-24 में 15 अरब डॉलर था। मध्य पूर्व में भारत ने आई2यू2 (भारत, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका) में भाग लिया है जो क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग का एक नया मंच है।
ग्लोबल साउथ में भारत की बढ़ती भूमिका उसकी बहु-संरेखण नीति का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है। 2023 के जी-20 नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में भारत ने अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत स्वयं को विकासशील देशों का स्वर बताता है और इस मंच के माध्यम से वैश्विक शासन सुधार, जलवायु वित्त, ऋण राहत और तकनीक हस्तांतरण जैसे मुद्दों पर दबाव बनाता है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन गया है। यह कूटनीतिक-तकनीकी साझेदारी भारत को वैश्विक दक्षिण में एक विश्वसनीय नेता की छवि देती है।
भारत की बहु-संरेखण नीति की सीमाएं और चुनौतियां भी हैं। फॉरेन पॉलिसी पत्रिका में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार 2025 भारत की विदेश नीति के लिए नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता संभालने के बाद से सबसे कठिन वर्ष रहा है। अमेरिकी शुल्क ने आर्थिक असुविधा पैदा की, पाकिस्तान संकट में अमेरिकी मध्यस्थता ने रणनीतिक स्वायत्तता को चुनौती दी और चीन के साथ व्यापार असंतुलन बढ़ता रहा। भारत की घरेलू कमजोरियां जैसे विनिर्माण आधार की सीमितता, सामाजिक असमानता और संस्थागत क्षमता की बाधाएं भी उसकी वैश्विक भूमिका को सीमित करती हैं। फिर भी, जब हम समग्र चित्र देखते हैं तो पाते हैं कि भारत की बहु-संरेखण कूटनीति उसे उस बहुध्रुवीय विश्व के लिए तैयार करती है जो तेजी से आकार ले रहा है। यह नीति एक ऐसे भारत की कहानी है जो न किसी का दास है, न किसी का मित्र केवल हितों के आधार पर — बल्कि एक ऐसा राष्ट्र है जो अपनी सभ्यतागत विरासत, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक जिम्मेदारी के बल पर 21वीं सदी की विश्व व्यवस्था को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प रखता है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
