हवन
ऋषिकेश में डॉ साहब दस दिन का विशाल हवन आयोजित कर रहे हैं। निमंत्रण पत्र हम तक पहुँच चुका है। मैंने बड़े उत्साह से डॉ साहब की पत्नी, रिया को फोन मिलाया— “हैलो रिया! तुम ऋषिकेश कब पहुँच रही हो?”
फोन के उस पार से एक दृढ़ आवाज़ आई— “अरे सिया, मैं नहीं आ पाऊँगी।”
मैं चौंकी—“क्यों भला?”
रिया ने गहरी साँस ली और बोली- “तुम तो जानती हो, मेरे वृद्ध सास-ससुर को मेरी ज़रूरत है। डॉक्टर साहब तो अपना क्लीनिक कभी भी बंद करके जहाँ चाहें, जब चाहें, जितने दिन के लिए चाहें, जा सकते हैं। लेकिन मेरे हिस्से में घर, बच्चे, और सास-ससुर की सेवा, सब आता है।”
मैंने धीरे से कहा—“रिया, तुम सच में घर की धुरी हो।”
“हाँ सिया, कर्तव्य पालन में ही मेरी आहुति है। हवन वहाँ हो रहा है, लेकिन मेरी पूजा तो यहीं है… इस घर की चौखट पर।”
— नील मणि
