बस इत्ती सी तो
अच्छा लगा था
जब बॉस ने बिना कहे,
बिना जताए, बिना बताए
ऑफिस की मेज़ पर
सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक
चुपचाप रख दिया था।
वो भावनात्मक रिश्ता
दिल से निकलकर
सीधे दिल तक पहुँच गया—
बस इतना ही तो चाहिए,
और बस…
हो गया नारी दिवस।
उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,
कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।
उन्होंने खिड़की से आती धूप को
बड़े करीने से
एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,
ताकि मेरी नींद
ज़रा और ठहर सके।
आँखें भर आती हैं…
हम सच में
इतने से ही खुश हो जाते हैं।
कोई आडंबर नहीं,
कोई शोर नहीं—
बस इतनी-सी ही तो बात है।
आज काजल नहीं लगाया तुमने,
दो भौंहों के बीच
वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।
क्या हुआ उदास हो क्या?
बस इतना पूछ लेना ही
काफी होता है,
वरना हम तो
इतनी-सी केयर पर भी
पागल हो जाते हैं।
किसी राह चलती
एक स्त्री को
ससम्मान नज़र देना,
उसकी देह पर
तंज़ न कसना
बस इतना ही तो…!
सच कहूँ,
अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह
हर दिन मिलते रहें,
तो फिर किसी
महिला दिवस की
ज़रूरत ही नहीं।
— सविता सिंह मीरा
