नारी ना कभी हारी
घर बाहर में आपसी तालमेल बनाना,
इन जिम्मेदारियों को सकुशल निभाना,
बहुत कठिन होता है सामंजस्य बैठाना,
आलोचनाओं को सहकर भी मुस्कुराना ।
बहुत सीमाएं लकीरें रास्ते में होती खड़ी,
सपनों की ये उड़ान होती मुश्किल बड़ी,
बदल कर तस्वीर उसने पार करी ये घड़ी,
आज नारी हौसलों से नर पर भारी पड़ी ।
बनाई नारी ने अपनी एक खास पहचान,
पार किए सूझ-बूझ से दुष्कर व्यवधान,
घोली “आनंद” मिठास रिश्तों के दरम्यान,
मेहनत हिम्मत से पूरे किए अपने अरमान ।
बनकर मिसाल बाधाओं को किया जो चूर,
आज हर क्षेत्र में बनी वो महारथी व मशहूर,
नारी को कहते थे जो घर तक सीमित मजबूर,
आज वे ठोक बजा यश उसका गाते भरपूर ।
योगदान विश्व में नारी शक्ति का है भारी,
आज जिसके समक्ष दुनिया झुकती सारी,
न रही वो अबला, मासूम, बेकार, बेचारी,
नारी ना कभी हारी नारी से सृष्टि है सारी ।
— मोनिका डागा “आनंद”
