राजनीति

युद्ध की अमानवीय विभीषिका, विजय की होड़ में मानवता दांव पर

मानव इतिहास के सबसे गहन और पीड़ादायक अध्यायों में से एक है,युद्ध की भयावहता, जहां हिंसा के नाम पर न केवल जीवन नष्ट होते हैं, बल्कि पूरी सभ्यता के मूल्य धूल में मिल जाते हैं। यह कोई विजयी परेड नहीं, बल्कि एक ऐसा भयानक तांडव है जो परिवारों को चूर-चूर कर देता है, सपनों को राख में बदल देता है और आने वाली पीढ़ियों को अनंत कष्टों का उपहार थमा देता है। जब हम युद्ध के चश्मे से हटकर देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कभी समाधान नहीं लाता ,बल्कि केवल विनाश की सतत् श्रृंखला को जन्म देता है। द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहता हो या हाल के संघर्ष  या विवाद, जो युद्ध  में परिणित  हो चुके हैं, जिससे हर बार नागरिक जीवन सबसे अधिक प्रभावित होता है, जहां निर्दोष बच्चे अनाथ हो जाते हैं, मां-बाप अपनों को खोकर खोखले हो जाते हैं, और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की कोई सीमा नहीं रह जाती। सुरक्षा का नामोनिशान मिट जाता है, लाखों  की संख्या में लोग बेघर होकर सीमाओं पर भटकते रहते हैं, अपने घर-गांव को पीछे छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।इस विभीषिका का एक और भयानक रूप स्वास्थ्य और भुखमरी का संकट है, जो युद्ध के दौरान मानवीय सहनशक्ति की सारी सीमाओं को तोड़ देता है। दवाओं की भारी कमी से घाव सड़ते रहते हैं, संक्रमण फैलता है और अस्पताल ध्वस्त हो जाने से मरने वालों की संख्या आसमान छूने लगती है। भोजन अभाव कुपोषण को जन्म देता है, ख़ासकर बच्चे जो कमज़ोर पड़कर भविष्य की नींव ही हिल जाते हैं, जबकि महामारियां अनियंत्रित होकर जनसंख्या को निगल लेती हैं। कानूनी उल्लंघनों की यह लंबी श्रृंखला और भी चिंताजनक है, जहां अंतरराष्ट्रीय नियमों को ठेंगा दिखाया जाता है। नागरिकों की सुरक्षा भूलकर स्कूल,  धार्मिक स्थल,अस्पताल निशाने पर आ जाते हैं, जो युद्ध अपराधों के रूप में सिद्ध होते हैं। विजय की होड़ में मानवता दांव पर लग जाती है, और विजेता भी अंततः एक खोखली जीत के साथ रह जाता है।तकनीकी युद्ध ने इस अमानवीयता को नई जटिलता प्रदान कर दी है, जहां ड्रोन आसमान से बिना भेदभाव के मौत बरसाते हैं, साइबर हमले बुनियादी सुविधाओं जैसे बिजली, पानी और संचार को ठप कर देते हैं, तथा सटीक मिसाइलें शहरों को गिनाती चली जाती हैं। सटीकता का दावा झूठा साबित होता है, क्योंकि अधिकांश हताहत निर्दोष नागरिक ही होते हैं। आर्थिक विनाश तो और भी विस्तृत है, महंगाई आसमान छूती है, गरीबी दोगुनी हो जाती है, तेल और खाद्य संकट व्यापार को ठहरा देते हैं। पर्यावरणीय तबाही के रूप में जंगल जलाए जाते हैं, नदियां ज़हरीली हो जाती हैं, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक धीमी मौत का कारण बनती हैं। दीर्घकालिक मानसिक आघात इसकी सबसे गहरी क्षति है, जहां पीढ़ियां आघातग्रस्त हो जाती हैं, शिक्षा रुक जाती है, मानसिक रोगों  के साथ महामारी फैल जाती है, और समाज के ताने-बाने टूटकर बिखर जाते हैं। आंकड़े चीख-चीखकर बताते हैं कि 90% हताहत नागरिक ही होते हैं, जो युद्ध के काले सत्य को उजागर करते हैं। फ़िर भी, इस अंधकार में शांति के व्यावहारिक उपाय संभव हैं और इन्हें अपनाना अनिवार्य है। कूटनीति को प्राथमिकता देकर बातचीत को अनिवार्य बनाना चाहिए, जहां मानवीय सहायता जैसे खाना, आश्रय और चिकित्सा तुरंत पहुंचे। शिक्षा के माध्यम से शांति संस्कृति को बढ़ावा देना होगा, हिंसा के त्याग को सामाजिक मूल्य बनाना होगा, तथा वैश्विक एकता से युद्ध अपराधों को कड़ी सजा सुनिश्चित करनी होगी। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों को मज़बूत करके संघर्षों का पूर्वानुमान और निवारण संभव है। अंततः युद्ध विभीषिका है, मानवता का अपमान इसे रोकने का एकमात्र मार्ग शांति चुनना है, क्योंकि जीवन ही सच्ची विजय है। यह चेतना ही हमें विनाश के चक्र से मुक्त कर सकती है। सोचिए विचार कीजिए  ।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।