चंचल चितवन कुसुमाकर मन और नयन सपनों में
चंचल चितवन कुसुमाकर मन और नयन स्वप्नों में,
ढूँढ रहा है अपनापन, बेगानों और स्वजनों में।
अपनों ने ही छोड़ दिया जब, किससे आस लगाएं,
कितना समझाया इस मन को,लेकिन समझ न पाए।
धनलिप्सा के कारण सबसे नाता तोड़ लिया है।
खुदगर्जों से उस जालिम ने, अब गठजोड़ किया है।
पत्नी ने समझाया, तो पत्नी को छोड़ दिया।
मात-पिता से भी उसने, अपना मुख मोड़ लिया।
मैंने कितना चाहा कि दिल भूल जाए उसको,
जिसने मुझको ठुकराया, क्यों याद करूँ उसको?
लेकिन मेरा पागल मन, यह बात समझ न पाए।
रात और दिन याद पिया की, मुझको बहुत सताए।
चंचल चितवन कुसुमाकर मन और नयन स्वप्नों में,
ढूँढ रहा है पागल मनवा, बेगानों अपनों में।
कोई उसे जाकर समझाए, धन तो बहुत कमाया।
लेकिन इस धन से अपनों को, तू क्या सुख दे पाया?
सुख- दुख में संगी- साथी ही, काम तेरे आएंगे।
विपद पड़ेगी, सब खुदगर्जी कन्नी काट जाएंगे।
इस धन का अभिमान न कर, यह साथ नहीं जाएगा।
खाली हाथ ही आया था, तू खाली हाथ जाएगा।
थोड़े नेक काम में, तू इस धन का कर ले खर्चा।
तेरी नेकनामियों की फिर होगी जग में चर्चा।
— राधा गोयल
