गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

आगे रहकर दाना उसे हम डालते हैं
आदत रही आस्तीन में सांप पालते हैं

आदत सुधरी है नहीं अब तक हमारी
भाई होकर उसी पर डाका डालते हैं

भरोसा हमने किया जिस पर गले गले तक
पीठ पीछे वो बंदुक हम पर तानते हैं

जलते हैं भीतर ही भीतर वे सदैव ही
प्रतिभा है हममें खूब ही ये मानते हैं

देखकर भी मुंह मोड़कर निकल गये आगे
यूं तो बचपन से वे हमें भी जानते हैं

हरिश्चंद्र जयचंद तो आज भी है मौजूद
रमेश को शत्रु समझ सूली पर टांगते हैं

— रमेश मनोहरा

रमेश मनोहरा

शीतला माता गली, जावरा (म.प्र.) जिला रतलाम, पिन - 457226 मो 9479662215