कविता

किताब

तेरे उपदेशों के सार से इस अद्भुत संसार में
अक्षर अब सिर्फ शब्दों के हथियार बन गए।
जहां ज्ञान का कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय था
वहां अब सिर्फ ज्ञान के तीखे बार बन गए।।

शिक्षा विभाग की तुलना सिर्फ शब्दों में
शिक्षण नीतियां अब सब व्यापार बन गए।
जहां सुदृढ़ नीति बचनों से संवाद होते थे
वहां अब सिर्फ वेद आकार बन कर रह गए।।

जहां संयुक्त संसार छिपा था अष्टांग वर्णों में
अब तो शिक्षा का सार मात्र कहावत रह गए।
सोचा था ज्ञान विज्ञान पढ़ कर साक्षर बनेंगे
शिक्षा सिर्फ किस्से कहानियां अखबार बन गए।।

जहां शिक्षा से अदृश्य शब्द भेदी वाण चलते थे
वहां अब सिर्फ शिक्षा के नि:शब्द संदर्भ रह गए।
जहां शास्त्रार्थों से कालिदास महाकवि बन जाते थे
वहां अब शिक्षा मात्र आमदनी के सिक्के रह गए।।

जहां सुबह शाम तुझे खोलने की होड़ में लगे रहते थे,
अब सिर्फ गूगल में तेरे तर्क वितर्क देखते रह गए।
पढ़ने से पहले तुझे माथे पर तिलक की तरह लगाते थे,
आज़ सिर्फ दिखावे के लिए हम सैयर करते रह गए।।

— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)