कविता

मेरा वाला ऐसा नहीं

घर की ना घाट की लव-जिहाद की शिकार बनी स्त्रियॉं,
कुचली जाती है हॅंसती-खेलती “आनंद” कोमल कलियॉं,
अपनों के ही ख़िलाफ़ बगावत करती नासमझ बेटियॉं,
प्यार में धोखा खा ये गुमसुम गुमराह आधी टूटी स्त्रियॉं ।

जिनके लिए संजोएं मॉं-बाप ने जीवन के रंगीन सपनें,
वो प्रेम में पड़ अनदेखा करे कौन पराए कौन है अपने,
आज को धकेल गर्त में छोड़ देती परिवार को तड़पनें,
ज्ञानेंद्रियों को नकार बस प्रेम की माला लगती जपने ।

ऑंखों पर पट्टी बॉंध वे कहती मेरा वाला ऐसा नहीं,
विपरीत लिंग आकर्षण में गुम हो जाती हैं वे कहीं,
प्यार में अंधे होकर संस्कारों को भुलाना सही नहीं,
ये भी सच हर प्रेमी युगल शाहरुख खान-गौरी नहीं ।

पवित्र प्रेम को वो शारीरिक आर्थिक चमक समझती,
वास्तविकता से परे प्रेमी के प्रेम-जाल में नित रमती,
अपने स्वतंत्र अस्तित्व की बलि देने में देर नहीं लगाती,
स्वयं भविष्य को उजाड़ गलत फैसले की मार सहती ।

अंततः शर्मिंदा हो गलतियों पर करें वे इंसाफ की टेर,
मगर समय हाथ से निकल जाता हो जाती है बहुत देर,
बटोरती कुछ दिन वो फिर अखबारों की सुर्खियॉं घनेर,
पर सच यहीं मासूम सी जिंदगी हो जाती रेत जैसे ढेर ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु