गीतिका
दुनिया की भीड़ में कहीं खो गई सी लगती हूँ
जाना था कहाँ, भीड़ में फँस गई सी लगती हूँ
आवारा झुंड के बीच ज्यूँ मासूम दब जाता है,
अपनी ही मंज़िल से भटक गई सी लगती हूँ
गुरूर था कभी ज़िंदगी के खास मकसद पर,
अब चमकती रोशनी में धूल सी लगती हूँ
प्रेम की गलियों में यूँ दर-दर भटकती हुई,
कोई अनजानी, भटकी आत्मा सी लगती हूँ
मोहब्बत के गलियारों में अब उजाला कहाँ,
इश्क की कोई दास्तां पुरानी सी लगती हूँ
घुल गया है ज़हर अब शहर की हवाओं में,
प्रेम की कोई डगर यादगार सी लगती हूँ।
— वर्षा वार्ष्णेय
