झूठी हमदर्दी
तकलीफ़ देकर फिर हमदर्दी जताना क्या है,
टांग काटकर फिर बैसाखी थमाना क्या है।
ज़ख़्म देकर मरहम का दावा भी करते हो,
ये दर्द देकर दिल को बहलाना क्या है।
आग लगाकर आँसू भी तुम ही बहाते हो,
खुद ही जलाना फिर पानी गिराना क्या है।
दिल को तोड़कर रिश्तों की बातें करते हो,
सौरभ, टूटे शीशे में चेहरा सजाना क्या है।
झूठी दिलासा से किसको सुकून मिलता है,
डूबते दिल को सपना दिखाना क्या है।
राह में काँटे बिछाकर साथ निभाने का,
फिर मंज़िल का मीठा गीत सुनाना क्या है।
जिसने दर्द दिया वही दवा भी बन बैठा,
ये ज़ुल्म छुपाकर खुद को सजाना क्या है।
सच तो ये है ‘सौरभ’ सब समझ ही जाता है,
झूठी ममता से रिश्ता निभाना क्या है।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
