तेल 120 डॉलर, IMF की चेतावनी और इतिहास का सबसे बड़ा आपूर्ति संकट
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टलीना जॉर्जीवा ने इस सप्ताह एक चेतावनी दी जो दुनिया के हर वित्त मंत्रालय में दीवार पर लिखी होनी चाहिए — ‘तेल कीमतों में प्रत्येक 10 प्रतिशत की वृद्धि जो साल भर बनी रहे, वैश्विक महंगाई को 0.4 प्रतिशत और बढ़ा देती है और दुनिया की आर्थिक उत्पाद में 0.2 प्रतिशत की गिरावट लाती है।’ ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 27 फरवरी को 71 डॉलर प्रति बैरल थी। युद्ध शुरू होते ही यह 80-82 डॉलर हुई, फिर 94 डॉलर, फिर 120 डॉलर के करीब पहुँची। आज 16 मार्च को यह 90 डॉलर के आसपास है। यानी 15 दिनों में कीमत में लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि। इसका अर्थ है — IMF के फार्मूले से — वैश्विक महंगाई में लगभग 1.08 प्रतिशत की वृद्धि और वैश्विक उत्पाद में 0.54 प्रतिशत की गिरावट। यह छोटी संख्याएँ लग सकती हैं, लेकिन 100 खरब डॉलर की वैश्विक अर्थव्यवस्था में 0.54 प्रतिशत का अर्थ है — लगभग 540 अरब डॉलर का नुकसान। और यह तभी है जब होर्मुज कुछ महीनों में खुल जाए। अगर यह बंद रहा, तो IEA के अनुसार यह ‘वैश्विक तेल बाजार इतिहास की सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा’ है।
World Economic Forum की इस सप्ताह प्रकाशित रिपोर्ट ‘द ग्लोबल प्राइस टैग ऑफ वॉर इन द मिडिल ईस्ट’ इस संकट को बहुत गहरे और दूरगामी परिप्रेक्ष्य में देखती है। रिपोर्ट कहती है कि यह केवल तेल का संकट नहीं है — यह ‘वैश्विक वस्तु बाजारों, खाद्य प्रणालियों, औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाओं, वित्तीय स्थितियों और भू-राजनीतिक संरेखणों को पुनर्गठित कर रहा है।’ होर्मुज जलसंधि से 2025 में प्रतिदिन 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल और 2024 में दुनिया के पाँचवें हिस्से का LNG गुजरता था। यूरोपीय प्राकृतिक गैस की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं। खाड़ी के उर्वरक वसंत ऋतु की बुआई के लिए जरूरी थे — उनकी देरी से 2027 तक खाद्य कीमतें प्रभावित होंगी। सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए जरूरी खाड़ी का हीलियम गायब है जिससे कार और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग प्रभावित होगा। यानी तेल से शुरू होकर यह झटका पूरी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में फैल रहा है।
CNN Business की 10 मार्च की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई। 2025 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने केवल 116,000 नौकरियाँ पैदा कीं — जो 2002 के बाद मंदी के बाहर का सबसे कम आँकड़ा है। पिछले नौ महीनों में से पाँच में नौकरियाँ घटी हैं। 2025 की चौथी तिमाही में अमेरिकी GDP वृद्धि महज 0.7 प्रतिशत रही। अब इस कमजोर बुनियाद पर तेल की कीमतों का झटका आया है। गैसोलीन की कीमतें 7.5 प्रतिशत बढ़कर 3.20 डॉलर प्रति गैलन हो गईं, 4 डॉलर प्रति गैलन का स्तर — जो 2023 के अंत के बाद नहीं देखा गया था — फिर दिख रहा है। JPMorgan Asset Management के मुख्य वैश्विक रणनीतिकार डेविड केली ने कहा — ‘बढ़ती नौकरी हानियाँ और बढ़ते गैस दाम एक बेहद खतरनाक एक-दो मुक्का है।’ Chatham House ने एक गंभीर परिदृश्य में यूरो जोन की दूसरी तिमाही में GDP संकुचन और बाद में सुस्ती का अनुमान लगाया है।
शिकागो विश्वविद्यालय के ऊर्जा नीति संस्थान के निदेशक सैम ओरी ने Al Jazeera को बताया कि ऐतिहासिक रूप से जब भी तेल की कीमत GDP के 4-5 प्रतिशत तक पहुँची है, तब हमेशा मंदी आई है। अमेरिका आज 1970 के दशक जितना तेल-निर्भर नहीं है, लेकिन 140 डॉलर प्रति बैरल का स्तर एक साल तक बना रहा तो मंदी लगभग तय है। होर्मुज की अनिश्चित बंदी के बारे में ओरी ने कहा — ‘होर्मुज की अनिश्चितकालीन बंदी इस संख्या को इतनी जल्दी पार कर देगी कि एक साल भी नहीं लगेगा।’ Peterson Institute के सीनियर फेलो और IMF के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री मॉरिस ऑब्सटफेल्ड ने कहा — ‘बहुत लंबे समय से होर्मुज बंदी ही वह दुःस्वप्न परिदृश्य था जिसने अमेरिका को ईरान पर हमले से रोके रखा। अब हम उसी दुःस्वप्न में जी रहे हैं।’ Dow Jones के 400 से अधिक अंक गिरने, S&P 500 के 0.7 प्रतिशत गिरने और यूरोपीय-एशियाई बाजारों में 1-2 प्रतिशत की गिरावट के साथ वित्तीय बाजारों ने पहले ही यह संदेश दे दिया।
World Economic Forum की रिपोर्ट में एशियाई देशों के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कही गई है — ‘भारत के पास पतले रणनीतिक भंडार हैं और वह मध्य-पूर्वी कच्चे तेल पर भारी निर्भर है।’ इसलिए भारत ‘लंबे समय तक बाधा के प्रति चीन से अधिक संवेदनशील’ है। Wikipedia के आर्थिक प्रभाव पृष्ठ के अनुसार एशियाई देश — चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया — खाड़ी के 75 प्रतिशत तेल और 59 प्रतिशत LNG के खरीदार हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश मूल्य के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 8 मार्च की एक AP तस्वीर में ईंधन की लंबी कतारें देखी गईं जहाँ लोग संभावित ईंधन संकट के डर से तेल भरवा रहे थे। भारत में उर्जा सब्सिडी और मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था है लेकिन लंबे समय तक 90 डॉलर से ऊपर का तेल सरकारी बजट पर असहनीय बोझ बनेगा। महंगाई बढ़ेगी, रुपया कमजोर होगा और RBI की ब्याज दर कटौती की योजना खटाई में पड़ सकती है।
The Times of Israel के हवाले से जो अमेरिकी आर्थिक आँकड़ा सामने आया वह सोचने पर मजबूर करता है — अमेरिकी परिवार कारों में ईंधन भरने पर सालाना औसतन 2,500 डॉलर यानी लगभग 50 डॉलर प्रति सप्ताह खर्च करते हैं। National Retail Federation के मुख्य अर्थशास्त्री मार्क मैथ्यूज के अनुसार यह खर्च बढ़ने से लोग खरीदारी, यात्रा और बाहर खाने पर कम पैसे लगाएँगे जिससे व्यवसाय नुकसान में आएँगे, कर्मचारी निकाले जाएँगे और यह एक ‘दुष्चक्र’ बन सकता है जो मंदी में समाप्त होगा। यही वह 1970 के दशक वाला ‘स्टैगफ्लेशन’ परिदृश्य है जिसका डर अर्थशास्त्री जता रहे हैं। अंतर यह है कि 1973 में अरब देशों के तेल प्रतिबंध से 4.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन बाधित हुए थे जबकि अब MIT के प्रोफेसर साइमन जॉनसन के अनुसार 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन प्रभावित हो रहे हैं और ‘दुनिया में कहीं भी इस अंतर को भरने की अतिरिक्त क्षमता नहीं है।’ यह युद्ध जितना लंबा चलेगा, वैश्विक अर्थव्यवस्था उतनी ही गहरी मुसीबत में पड़ती जाएगी।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
