ग़ज़ल
बन रही आज दीवार अब क्या करें।
नफ़रतों से करें प्यार अब क्या करें।।
ये ज़माना किधर जा रहा है सोच लो।
है तबाही के आसार अब क्या करें।।
बात होती ज़रा-सी कलह ही करें।
हो बहुत ही तक़रार अब क्या करें।।
देख धोखा दिये जा रहे आज ही।
देख ठगते सभी यार अब क्या करें।।
बच ज़रा ही रहो शत्रु है सामने।
हो सरे-आम ही वार अब क्या करें।।
देख सच्ची मुहब्बत ठगी जा रही।
बेवफ़ा से हुआ प्यार अब क्या करें।।
बिछुड़ते ही लगा रोग देखा न हो।
अब यही दे हमें मार अब क्या करें।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
