कतर-ब्योंत
जेब में चंद रूपये और जरूरतें सुरसा की तरह मुंह बाये उसे कसौटी पर कसने को तैयार थी । राजन ! हाहाहाहाहा नाम माँ बाबूजी शायद बिना सोचे समझे रख दिये थे । उसे भी होश कहां था बचपन से लेकर जवानी तक अपना नाम किसी के मुंह से सुनकर मन ही मन फूला नहीं समाता था ।
अब अपने ही नाम से चिढ हो गई थी। बेटे ने अपनी पेंसिल खो दी थी । बिटिया को भी ड्रांइग क्लास के फीस भरने थे । काम वाली भी पांच सौ एडवांस मांग रही थी। समझ में नहीं आ रहा था कि, कैसे सारी जरूरतें पूरी करें । सब्जी वाले के ठेले पर ताजी-ताजी सब्जियां देख कर जी मचल उठा । पर विवेक उसे विचलित होने नहीं दे रहा था ।
आखिर जीत विवेक की हुई। डॉक्टर कहते हैं – एक टमाटर में एक सेव जितनी पौष्टिकता होती है। वह पैसे गिनते हुए आलु-टमाटर का मोल-भाव करने लगा । थैले में टमाटर संग आलू-प्याज लेकर घर जाते हुए मन ही मन खुश था महंगाई कितना भी चिढाये मुंह का निवाला नहीं छिन सकता । घर पहुंचते ही पत्नी थैले से सब्जियां निकालते ही बरस पड़ी- “कभी तो हरी सब्जियां लाइये, आलु के सिवा और कुछ नयी सब्जी कभी नहीं लाते, वही सब्जी लाते हैं जो बाजार में सस्ती हो जाती हैं।”
“ नाम राजन है, परंतु चाहकर भी राजाओं वाली जिंदगी नहीं जी सकता । शुक्रिया उस परमपिता को कहो- शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की जिंदगी से वंचित नहीं हो ।”
— आरती रॉय
