‘धुरंधर’ की जीत
चहूँओर धुरंधर की गूंज पर्दे पे हैं आग लगी,
कहानी की तलवार से ‘खामोशी’ जाग उठी।
लहू के रंग में भी कहीं एक सच चमकता है,
नायक नहीं इंसान स्वयं अंदर से दमकता है।
आपकी नज़रें जो ठहरें, तो तूफ़ान बोल उठे,
हरेक दृश्य देखकर जैसे हज़ारों सवाल उठे।
दर्द की मिट्टी से जैसे साहस का फूल खिला,
मिले प्रत्येक ज़ख्म में जीत का उसूल मिला।
अब सिनेमा सपनों से भी आगे निकल गया,
किरदार अपने ही अंदर जीवंत निकल गया।
यहाँ धुरंधर की राह में डर भी झुक जाता है,
सच के सामने हर झूठ ‘पिघलकर’ गिरता है।
ये सिर्फ़ कहानी नहीं सत्य का एक आईना है,
जहाँ हर दर्शक को स्वयं से ‘रूबरू’ होना है।
यहाँ धुरंधर की जीत से ही सबको आह्वान है,
ये नया दौर है और यही असली तलवार है।
— संजय एम तराणेकर
