श्राद्ध और बरसी में पुरखों का महिमागान भी करें
आज के मुकाबले अतीत में हमारे पूर्वज विद्वान, ज्ञानी-विज्ञानी, पराक्रमी और सभी प्रकार के पुरुषार्थों, कलाओं, सांस्कृतिक साहित्यिक विधाओं, प्राच्यविद्याओं से लेकर जीवन और जगत के तमाम विषयों के जानकार थे। उनके त्याग, तपस्या और संघर्ष के आगे हमारा जीवन कुछ भी नहीं।
आज हम पूर्वजों के नाम पर उत्तर क्रियाओं, संवत्सरी, बरसी, मासिक, षण्मासिक एवं वार्षिक श्राद्ध सहित साल भर में पितर पूजा और अन्य नामों से कई सारे अनुष्ठान, पूजा-पाठ, आवाहन और जीमण करते रहते हैं, जिनमें हम परिवार सहित भाग लेते हैं।
इनमें उन पुरखों की पीढ़ी दर पीढ़ी के वंशज और पोते-पोतियां तक भाग लेते रहे हैं। लेकिन जिन पूर्वजों के नाम पर हम ये सारे कार्य करते रहे हैं, उन पूर्वजों के नाम के सिवा हमारे वंशज कितना जानते हैं? इस बारे में कभी चिन्तन करें तो दुर्भाग्यजनक स्थितियां ही दिखती हैं।
आज हम सारे लोग पूर्वजों या पितरों के नाम पर जीमण ही जीमण करते रहते हैं, स्वाद ले लेकर पेट भरते हैं और दान-दक्षिणा पाकर अपनी रोजमर्रा की राह पर चल पड़ते हैं।
कई बार हमारे वंशजों तक को यह पता नहीं होता कि हम जिनके नाम पर भोजन का मजा ले रहे हैं, पूजा-पाठ और अनुष्टान करवा रहे हैं, वे कैसे थे, उनका व्यक्तित्व और कृतित्व कैसा था, उनका जीवन और व्यवहार किस तरह से था और पारिवारिक स्थितियों से लेकर उन्नति में उनका योगदान किस तरह का था।
जब तक हम नई पीढ़ी को उनके बारे में नहीं बताएंगे, तब तक उनसे प्रेरणा कैसे प्राप्त कर पाएंगे। यह यक्ष प्रश्न हर परिवार में होना चाहिए।
इसलिए जरूरी है कि हम अपनी संतति को अपने पुरखों के बारे में बताएं। उनकी जयन्ती और पुण्य तिथि, श्राद्ध और अन्य तिथियों पर उनसे संबंधित जानकारी समस्त परिवारजनों के बीच साझा करें। उनके बारे में लिखें, प्रकाशित करवाएं।
उनकी खूबियों और संघर्ष की कहानी के महत्त्वपूर्ण पहलुओं के बारे में सभी के समक्ष बातचीत करें। संभव हो तो उन पर छोटी सी पुस्तक या फोल्डर प्रकाशित करवा कर कुटुम्बियों और परिचितों में वितरित करें।
इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पुरखों को लेकर हम केवल स्वाद का आनन्द ही पा रहे हैं, उनके बारें में कुछ कहने या कहने की न उदारता है, न श्रृद्धा का भाव।
इस स्थिति को दूर किए बगैर पूर्वजों के प्रति श्रृद्धा और श्राद्ध आदि सभी कर्म दिखावा ही हैं। जो पीढ़ी पूर्वजों के इतिहास से प्रेरणा प्राप्त नहीं करती, वह अपने जीवन लक्ष्य से भटक जाती है।
अपनी पूरी जिन्दगी में जब भी पुरखों या पितरों की स्मृति का कोई सा दिवस या तिथि हो उनके महिमागान पर भी ध्यान दें। उन पर आलेख लिखें, प्रकाशित कराएं, सोशल मीडिया पर उनके जीवन की विशेषताओं और उपलब्धियों पर पोस्ट करें, उनसे संबंधित अविस्मरणीय छायाचित्रों एवं वीडियो क्लिप्स को साझा करें।
सच्चे अर्थों में पूर्वजों का महिमागान ही उनके प्रति सच्ची श्रृद्धान्जलि है। जो लोग ऐसा करते रहे हैं, वे धन्य हैं। पूर्वजों की सूक्ष्म कृपा उन पर सदैव बनी रहती है। पर उन लोगों को क्या कहें जो पूर्वजों और पितरों के नाम पर माल तो उड़ा रहे हैं, उनकी जमीन-जायदाद और संचित धन-वैभव का बेहिसाब मजा लूट रहे हैं, मगर उनके नाम पर कुछ करते नहीं।
करते भी हैं तो मामूली दिखावा और लजीज पकवानों से उदरपूर्ति। वे पूर्वज भी इस कृतघ्न पीढ़ी पर कुपित रहते हुए कभी कालसर्प दोष मढ देते हैं, कभी पितर दोष, और कभी कुछ और।
इन सभी प्रकार के विषमताजनक हालातों में बहुत जरूरी हो चला है कि हम अपनी वंश परम्परा और संस्कृति से जुड़े रहें, वरना कुछ साल और बीतने के बाद कहीं के नहीं रहेंगे।
— डॉ. दीपक आचार्य
