नन्हा सा खरबूज
एक हरा-भरा बाग,
कोयल गाए राग।
गाड़ी में बैठा बच्चा,
देखे आगे भाग।
गोद में गोल खरबूज,
मन में मीठा साज,
छोटी-सी उँगली से,
छेड़े इसका राज।
कुतर-कुतर कर खाए,
रस टपके हर बार,
गालों पर मुस्कान,
आँखों में त्यौहार।
अहा! हुआ मालामाल,
मीठा-मीठा हर ख्याल,
बीज छोटे-छोटे जैसे,
तारों की हो डाल।
मीठे रस का थाल,
भाए न अब कुछ और,
हँसी-ठिठोली संग में,
खुशियों का है जोर।
मिट गई सबकी प्यास,
बढ़ी खुशी की आस,
नन्हा सा ये बचपन,
सबसे खास, सबसे खास।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
