कविता
सोचता हूं…
पश्चिमी सभ्यता की दहलीज पर बैठा हुआ
पूर्व का यह आदमी
भीतर जो कभी भरा पूरा हुआ करता था
एकदम खाली कैसे हो गया
उसके भीतर से पुरखों का रक्त सूख गया
या उसके भीतर कोई
मोहभंग का विषैला पौधा उग आया।
आज वह जिस तरह खोखली चकाचौंध को
दोनों हाथों से बटोरने में लगा है
लगता है उसे न तो पुरखों की हिदायतों का
निर्मल जल मिला है
और न ही संस्कारों की छांव।
वह अपने पुरखों के सारे आदर्श
आज फिर ताक पर रखकर आ गया है
इस अनचाही दहलीज पर जहां भौतिकवाद
अतृप्त वासनाएं अंजलि भर भर कर बांट रहा है।
आदमी की झोली भर जाने के बाद भी ये अतृप्त
वासनाएं पूरा होने का नाम नहीं लेतीं
और भीतर से यह खोखला आदमी
भरा पूरा होने के लिए
न जाने कितनी बैसाखियां कंधे पर उठाए
दर-दर भटक रहा है।
उसे अपने पुरखों की याद क्यों नहीं आती
उनकी नसीहतें अब उसके काम क्यों नहीं आती
सिद्धांतों से भरी भारी भरकम पोथियां
उसका इस अतृप्त भटकन में मार्गदर्शन क्यों नहीं करतीं
मैं सोचता हूं आदमी के इस भीतरी खोखलेपन पर
कोई कविता क्यों नहीं लिखता….।
— अशोक दर्द
