मौसम और किसान की चिंता
बदलें मौसम का “मिज़ाज” देख घबराया किसान,
बादलों की आँख-मिचौली में उलझ गये अरमान।
यहाँ कभी धूप तो कभी बरखा, खेल रही है चाल,
खेतों में खड़ी फसलें अब सहम रहीं ये हैं सवाल।
जब हवा चली “गेहूं” झुका जैसे थककर हो सोया,
ओलों की मार ने आके उनके सपनों को हैं धोया।
ये कट चुकी जो फसल पड़ी थी, भीग गई वो रात,
यहाँ मेहनत की हर एक बूंद पे पड़ गई जैसे घात।
इस हार्वेस्टर की आवाज़ों में भी दौड़ रहा हर गाँव,
महंगा किराया, लंबी हुई लाइनें, बढ़ा रही हैं घाव।
मजदूर भी अब दूर हुए हैं उनके रेट हुए आसमान,
इस थ्रेशर के प्रत्येक चक्कर में ये टूट रहा किसान।
वैसे चना-सरसों की ढेरियाँ भी देखती रही हैं राह,
कब कहाँ से कोई आकर समेटे कब मिटे ये चाह।
समझो दिन-रात की मेहनत जैसे बन गई है बोझ,
मौसम की इस मार में किसान खो गया हर सोच।
फिर भी उम्मीदें ज़िंदा हैं धरती माता जो हैं साथ,
आज भी किसान खड़ा है लके हिम्मत का हाथ।
हर संकट से लड़कर के आया यह अन्नदाता वीर,
कल फिर से सोना उगलेगा उसका हर एक नीर।
— संजय एम तराणेकर
