पीछा नहीं छोड़ेगी हताशा
खमोश सी ठंडी सर्द रात में दरवाजे पर दस्तक हुई
कम्बल लपेटे कांपते कांपते मैंने दरवाजे की कुंडी खोली
बाहर खड़ा था कोई साया थर थर कांप रहा था
मैंने धीरे से पूछा कौन हो तुम मैं हूँ हताशा वह बोली
मैं एकदम से डर गया लगा करने दरवाजा बंद
वह बोली डरो मत मुझसे मैं हूँ यहां बिल्कुल अनजान
अंदर आकर वह सोफे पर बैठ गई ठंड से परेशान
बगल में कुछ छुपाया था उसने जब गया मेरा ध्यान
अंदर ही अंदर डर रहा था पर बाहर हौसला दिखा रहा था
कहीं पिस्तौल तो नहीं मन ही मन सोच कर घबरा रहा था
हताशा बोली ठंड बहुत है क्या एक कप चाय मिलेगी
क्या करेगी वह मुड़ मुड़ कर देखता किचन को जा रहा था
चाय पीकर हताशा बोली क्यों इतना घबरा रहे हो
चेहरे से तुम्हारे लग रहा मन की बात छुपा रहे हो
मैंने कहा मुझे किसी का डर नहीं क्यों घबराउंगा
कुछ नहीं है मेरे दिल में क्या तुमसे छुपाऊँगा
मैं तो खुश रहता हूँ मन पसंद का खाता हूं
घूमने का मन हो तो कहीं भी चला जाता हूँ
सेवानिवृत हूँ अब नहीं कोई बंदिश किसी की
माता पिता की छत्रछाया में समय बिताता हूँ
हताशा ने बगल से कुछ निकालते जोर का ठहाका लगाया
वह क्यों हंस रही थी यह मैं समझ नहीं पाया
बोली यह सूची है उनकी जो रहते हैं हताश
उत्सुकतावश मैं अपना नाम देखने उसके नज़दीक आया
हताशा बोली इस सूची में है उनके नाम जो है जिंदगी से निराश
कभी किसी ने मुस्कुराते नहीं देखा उनको रहते हैं हताश
तुम्हारा नाम नहीं है क्योंकि तुम हो जिंदादिल इंसान
चली मैं अब उनके पास जिन्हें जीवन से नहीं है कोई आस
हताशा चुपके से उठी कमरे से बाहर निकल गई
दम घुट रहा था उसका मेरे कमरे में थी विराजमान आशा
उम्मीद रखना मत पास आने देना तुम निराशा
वरना चिपक जाएगी पीछा नहीं छोड़ेगी हताशा
— रवींद्र कुमार शर्मा
