कहानी

मिलन

मेहरा गांव कोहरे की क़ैद और ख़ामोशी चीखें जो शायद हर गांव की एवं का मुक़द्दर था,
​ गाँव में सूरज की पहली किरण जब देवदार के ऊंचे पेड़ों को छूती थी, तो गाँव वालों के लिए वह सिर्फ़ एक नए दिन की शुरुआत नहीं, बल्कि पुरानी बंदिशों का दोहराव होती थी। सुमन की सुबह घर के पिछवाड़े में लकड़ियाँ बीनने और भारी भरकम गागर में पानी भरने से शुरू होती। उसकी उम्र के इस पड़ाव पर, जहाँ शहर की लड़कियाँ रंगीन सपनों और किताबों की दुनिया में खोई रहती थीं, सुमन के कंधों पर पूरे घर की ‘मर्यादा’ का बोझ था।
​उसके पिता, शिवराम, एक कठोर स्वभाव के इंसान थे, जिनके लिए बेटी का अर्थ सिर्फ़ ‘पराया धन’ था। सुमन अक्सर रात के अंधेरे में अपनी झोपड़ी की खिड़की से दूर दिखती शहर की रोशनियों को निहारती। उसे लगता जैसे वे रोशनियाँ उसे पुकार रही हैं। उसके पास एक पुरानी फटी हुई डायरी थी, जिसमें वह पुराने पेन से अपने मन की बातें लिखती रहती”क्या ये पहाड़ मेरी दुनिया की दीवारें हैं या मेरी मंज़िल का रास्ता?” अभाव इतना था कि नई क़लम ख़रीदना भी एक सपना था, पर इरादा इतना पक्का कि मिट्टी पर उकेरे अक्षर भी उसके हौसले की गवाही देते थे।
​शहर का मुसाफ़िर था वो और इल्म की किरण लेकर मेहरा गांव आया था,
​तभी गाँव के जर्जर स्कूल की क़िस्मत बदली। राजू, जो शहर की आपाधापी और बनावटी रिश्तों से टूटकर यहाँ सुकून की तलाश में आया था, स्कूल का नया इंचार्ज बना। वह साधारण सूती कुर्ता पहनता और उसकी आँखों में एक अजीब सी सौम्यता थी। पहले ही दिन उसने देखा कि गाँव के लड़के तो स्कूल आ रहे हैं, पर लड़कियाँ खेतों में पसीना बहा रही हैं।
​राजू की नज़र एक दिन सुमन पर पड़ी, जो स्कूल की दीवार के पीछे छिपकर गौर से ब्लैकबोर्ड पर लिखे ‘इतिहास’ के पाठ को सुन रही थी। राजू उसके पास गया। सुमन डरकर भागने ही वाली थी कि राजू की आवाज़ ने उसे रोक लिया,”पढ़ना कोई गुनाह नहीं है सुमन, ये तो अंधेरे में दिया जलाने जैसा है।” राजू ने उसे अपनी पहली किताब भेंट की,महापुरुषों की जीवनियाँ। उस दिन से राजू सिर्फ एक शिक्षक नहीं, बल्कि सुमन के लिए वह पुल बन गया जो उसे गुमनामी से पहचान की ओर ले जाने वाला था। राजू उसे स्कूल के बाद एक घंटे पढ़ाता। उसने सुमन को सिखाया कि कैसे अपनी ग़रीबी को अपनी कमज़ोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताक़त बनाना है।
​इश्क़ का इम्तिहान और समाज का प्रहार दोनों की राहें अलग ही दिशा में होती हैं।
​जैसे-जैसे सुमन के ज्ञान का दायरा बढ़ा, उसकी आँखों की चमक बदलने लगी। वह अब दबी-कुचली लड़की नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाली छात्रा बन चुकी थी। लेकिन समाज की संकुचित सोच को एक लड़की का सिर उठाकर चलना रास नहीं आया। गाँव की औरतों ने कानाफूसी शुरू कर दी,”मास्टर और जवान लड़की… पहाड़ की लाज अब खतरे में है।”
​एक शाम जब सूरज ढल रहा था, गाँव की पंचायत बैठी। राजू पर लांछन लगाए गए। सुमन के पिता ने उसे सरेआम थप्पड़ मारा और उसकी किताबें चूल्हे की आग के हवाले कर दीं। राजू के सामने दो रास्ते थे,या तो वह वहीं रहकर सुमन की बदनामी का कारण बनता, या पीछे हटकर उसे खुद से लड़ने का मौका देता।
​राजू ने भारी मन से फ़ैसला लिया। उसने गाँव छोड़ने से पहले सुमन को एक संदेश भिजवाया “सुमन, मेरी जुदाई को अपनी ढाल बनाना। मैं जा रहा हूँ ताकि गाँव वालों का ध्यान भटक जाए और तुम अपनी एकांत साधना कर सको। याद रखना, जिस दिन तुम सफल होगी, उस दिन मेरा यह ‘अपमान’ ही मेरा ‘सम्मान’ बन जाएगा।” वह रात मेहरा गांव के इतिहास की सबसे लंबी रात थी। राजू जा चुका था, और सुमन का सहारा टूट चुका था, पर उसका हौसला अब वज्र जैसा हो गया था।
​तपस्या और बेड़ियों की खनक अटल थी,इरादे मजबूत हो चुके थे।
​राजू के जाने के बाद अगले पाँच साल सुमन के लिए किसी नारकीय यंत्रणा से कम नहीं थे। समाज ने उसे ‘कलंकित’ मान लिया था। उसके पिता ने उसका रिश्ता एक ऐसे व्यक्ति से तय कर दिया जो उम्र में उनसे भी बड़ा था। लेकिन सुमन ने ज़िद की और अंततः अपने पिता को इस शर्त पर मनाया कि वह घर का सारा काम करेगी, पर रात को उसे पढ़ने की अनुमति दी जाए।
​उसने अभाव की चरम सीमा देखी। सर्दियों की उन रातों में जब बर्फ़बारी से हाथ-पाँव जम जाते थे, सुमन अपनी फटी रजाई में सिमटकर चिमनी की मद्धम रोशनी में ‘संविधान’ और ‘प्रशासन’ की जटिलताओं को समझती। राजू शहर से किसी अज्ञात माध्यम से उसे नई किताबें और परीक्षा के फ़ॉर्म भेजता रहा। उसकी उंगलियाँ जो कभी नरम थीं, अब पत्थर काटने और खेतों में काम करने से खुरदरी हो चुकी थीं, पर उन्हीं हाथों ने हज़ारों पन्ने लिखकर अपनी तक़दीर बदली। उसने ताने सुने, पत्थर सहे, पर अपनी आँखों का पानी कभी सूखने नहीं दिया।
​फिर वह ऐतिहासिक दिन आया। संघ लोक सेवा आयोग का परिणाम घोषित हुआ। छोटे से गाँव की एक लड़की, जिसने कभी शहर की चकाचौंध को कभी नहीं देखा था, उसने पूरे प्रदेश में परचम लहरा दिया। ख़बर बिजली की तरह फ़ैली।
​गाँव के लोग स्तब्ध थे। वही मुखिया, जिसने राजू को निकाला था, आज सुमन के घर के बाहर हार लेकर खड़ा था। पहाड़ का सीना चीरकर जो रास्ता सुमन ने अपनी क़लम से बनाया था, आज उस पर पूरा गाँव गर्व कर रहा था। लेकिन सुमन के लिए यह जीत अधूरी थी। वह लाल बत्ती की गाड़ी में बैठकर जब अपनी पहली पोस्टिंग पर निकली, तो उसने सबसे पहले अपने गाँव का रुख़ किया।
​गाँव की सरहद पर हज़ारों की भीड़ थी। जैसे ही सुमन गाड़ी से उतरी, पूरा माहौल ‘बेटी ज़िंदाबाद’ के नारों से गूँज उठा। सुमन की नज़रें भीड़ को चीरती हुई उस पुराने पीपल के पेड़ की ओर गईं। वहाँ एक सादे से लिबास में राजू खड़ा था। बॉबी शायद सुमन से मिलने ही आया होगा क्योंकि उसने वैसे तो अपना ट्रांसफ़र दूसरे गांव में यहां से दूर करवा लिया था,उसकी आँखों में वह संतोष था, जो एक मूर्तिकार को अपनी मूर्ति के पूर्ण होने पर मिलता है।
​सुमन ने प्रोटोकॉल तोड़ दिया। वह अपनी नीली बत्ती वाली गाड़ी से उतरी और दौड़कर राजू के पास पहुँची। उसने सबके सामने झुककर राजू के चरणों की धूल माथे पर लगाई। पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया।
​सुमन ने कहा “राजू सर, आज ये वर्दी और ये रुतबा सिर्फ़ मेरा नहीं है। ये उस भरोसे की जीत है जो आपने एक मामूली सी लड़की पर दिखाया था।”
​राजू ,चुपचाप खड़ा था लेकिन गर्व से भरा हुआ,भर्राई आवाज़ में बोला “सुमन, आज तुमने मेरी हार को जीत में बदल दिया। अब इस पहाड़ की कोई भी बेटी बेड़ियों में नहीं रहेगी।”
​उस शाम मेहरा गांव की वादियों में जुदाई का दर्द भी ख़त्म हुआ और एक ऐसा मिलन हुआ जहाँ समाज की रूढ़ियाँ हार गईं और ‘शिक्षा’ व ‘सच्चे प्रेम’ की विजय हुई। वह अफ़साना अब एक मिसाल बन चुका था, जो सदियों तक इन पहाड़ों में गूँजता रहेगा।

— डॉ मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।