ग़ज़ल
सम्बंध इस तरह हमारे बीच हो गए,
जरूरी दूरियों के फ़ैसले हो गए।
कोरे कागज़ से बस रह गए हम,
शब्द मेरे सारे जाने कहाँ खो गए।
चाहा था बहुत कुछ कहना तुमसे,
फिर मौन के मौन से संवाद हो गए।
तुम अपने थे तो शिकवे ही शिकवे थे,
मुस्कुरा के मिलने लगे, जब से गैर हो गए।
ख़्वाब जो जगाते थे मुझको रात भर,
वो भी थक कर जाने कहाँ सो गए।
हम भी थे कभी ज़िंदादिल इंसान,
लोग कहते हैं अब पत्थर से हो गए।
दिल की गलियों में अब सन्नाटा है,
रौनकें थीं जहाँ, वो घर वीरान हो गए।
यादों की धूप में जलते रहे हम,
छाँव के सारे मौसम भी ओझल हो गए।
— प्रज्ञा पांडेय मनु
