कविता

बेबस

दोराहे पर खड़ा ये जीवन,
थका हुआ, टूटा सा मन,
मौत के इंतज़ार में जैसे
हर घड़ी लगे बोझिल मन।

ना दवा कोई काम करे अब,
ना दुआ में वो असर रहा,
साँसें जैसे उधार की हों,
हर धड़कन पर डर सा रहा।

क्यों जीना चाहता है मन ये,
जब सीमा लिख दी किस्मत ने,
क्यों सपनों की चादर ओढ़े
जलता रहता है उलझन में।

आशिक बनकर आवारा सा
मन व्यर्थ ही भटक रहा,
जिसे पाया ही नहीं कभी,
उसी में खुद को ढूँढ रहा।

कैसे छोड़ दे मोह का धागा,
हर पल यही तो तोड़ रहा,
ज़िंदगी अभी भी बाकी है,
बेबसी में खुद से रूठ रहा ।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com