बेबस
दोराहे पर खड़ा ये जीवन,
थका हुआ, टूटा सा मन,
मौत के इंतज़ार में जैसे
हर घड़ी लगे बोझिल मन।
ना दवा कोई काम करे अब,
ना दुआ में वो असर रहा,
साँसें जैसे उधार की हों,
हर धड़कन पर डर सा रहा।
क्यों जीना चाहता है मन ये,
जब सीमा लिख दी किस्मत ने,
क्यों सपनों की चादर ओढ़े
जलता रहता है उलझन में।
आशिक बनकर आवारा सा
मन व्यर्थ ही भटक रहा,
जिसे पाया ही नहीं कभी,
उसी में खुद को ढूँढ रहा।
कैसे छोड़ दे मोह का धागा,
हर पल यही तो तोड़ रहा,
ज़िंदगी अभी भी बाकी है,
बेबसी में खुद से रूठ रहा ।
— मुनीष भाटिया
