जिराती
सखाराम के हाथों की लकीरें मेहनत की मज़दूरी करते-करते घिस चुकी थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक सपना अभी भी ज़िंदा था। उसके पास कुल जमा पूँजी के नाम पर गाँव में एक एकड़ ज़मीन थी। वह और उसकी पत्नी धनिया दिन-रात उस ज़मीन में पसीना बहाते, सब्जियाँ उगाते और उन्हें बाज़ार में बेचकर पाई-पाई जोड़ते। सखाराम का एक ही लक्ष्य था,उसका बेटा ‘आकाश’ पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने। वह अक्सर धनिया से कहता, “हमें भले ही आधी रोटी खानी पड़े, पर आकाश को शहर के बड़े स्कूल में पढ़ाएंगे। मेरी पीठ का बोझ मेरा बेटा उतारेगा, वह साहब बनेगा।”
किस्मत ने साथ दिया और सखाराम की बरसों की तपस्या रंग लाई। आकाश की पढ़ाई पूरी हुई और उसे शहर की एक बहुत बड़ी कंपनी में ऊँचे पद पर नौकरी मिल गई। पूरे गाँव में मिठाई बँटी। सखाराम का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। कुछ महीने बीत गए, आकाश शहर की चकाचौंध में रच-बस गया था। काम की व्यस्तता का बहाना बनाकर उसने गाँव आना लगभग बंद कर दिया।
एक दिन सखाराम के मन में ममता जागी। उसने सोचा, “बेटा काम में उलझा है तो क्या हुआ, बाप तो जा सकता है।” उसने धनिया से कहकर घर के बने लड्डू बँधवाए, खेत से ताज़ी लौकी और साग तोड़ा और एक पुराने फटे हुए थैले में भरकर शहर के लिए निकल पड़ा।
शहर की ऊँची इमारतें और शोर-शराबा सखाराम के लिए अजनबी था। बड़ी मुश्किल से वह उस पॉश कॉलोनी के आलीशान फ्लैट तक पहुँचा जहाँ आकाश रहता था। सखाराम ने जैसे ही दरवाज़े की घंटी बजाई, एक आधुनिक युवती ने दरवाज़ा खोला। वह आकाश की मंगेतर थी। सखाराम ने सादगी से मुस्कुराते हुए पूछा, “बेटा आकाश है क्या? मैं उसका बापू हूँ।”
तभी पीछे से कोट-पैंट पहने आकाश बाहर आया। पिता को उस हालत में,मैले कपड़े, पैरों में टूटी चप्पल और हाथ में वह पुराना थैला लिए देखकर,आकाश के चेहरे पर खुशी के बजाय एक अजीब सी घबराहट और शर्मिंदगी दौड़ गई। सामने उसकी मंगेतर और उसके कुछ हाई-प्रोफाइल दोस्त खड़े थे जो किसी फंक्शन में जाने की तैयारी कर रहे थे।
आकाश ने सखाराम को अंदर बुलाने के बजाय उसे सीढ़ियों के पास खींच लिया और धीमी आवाज़ में झिड़कते हुए बोला, “बापू! आप यहाँ इस हाल में? कम से कम बता कर तो आते। देखिए सब मुझे देख रहे हैं, क्या सोचेंगे लोग?”
सखाराम की मुस्कुराहट वहीं जम गई। उसने कांपते हाथों से थैला आगे किया, “बेटा, ये तेरी माँ ने लड्डू भेजे हैं और ये ताज़ी सब्जियाँ अपनी ज़मीन की हैं…”
आकाश ने चिढ़कर कहा, “बापू, यहाँ सब कुछ मॉल से आता है। ये सब पुराने थैले यहाँ मत फैलाइए। आप नीचे गैरेज के पास रुकिए, मैं ड्राइवर से कहकर आपको बस स्टैंड छुड़वा देता हूँ। अभी मेरा एक ज़रूरी ‘फ़ंक्शन’ है।”
सखाराम का मन टूट चुका था। वह चुपचाप वहाँ से जाने ही वाला था कि तभी दूर खड़े आकाश के रईस दोस्तों में से एक ने पास आकर कौतूहल से पूछ लिया, “अरे आकाश! कौन हैं ये बुजुर्ग? काफ़ी देर से खड़े हैं, कुछ चाहिए क्या इन्हें?”
आकाश के माथे पर पसीना आ गया। उसे लगा कि अगर उसने इन्हें ‘बाप’ बताया तो उसकी झूठी शान मिट्टी में मिल जाएगी। उसने नजरें चुराते हुए बड़ी बेरुखी से कहा, “अरे कोई ख़ास नहीं, ये हमारा ‘जिराती’ (खेती का नौकर) है। गाँव में हमारा फ़ॉर्म हाउस है न, वहीं काम देखता है। शायद कुछ अनाज के सिलसिले में आया था।”
सखाराम अभी कुछ ही क़दम दूर गया था। बेटे के मुँह से खुद के लिए ‘नौकर’ शब्द सुनकर उसके पैर वहीं पत्थर के हो गए। अपमान की एक लहर उसके पोर-पोर में दौड़ गई। वह तुरंत पीछे पलटा और सीधा आकाश के उन अमीर दोस्तों के बीच जा खड़ा हुआ। सखाराम की आँखों में गज़ब की गरिमा और सच्चाई की चमक थी। उसने आकाश के दोस्तों की तरफ देखा और स्थिर स्वर में बोला,
“साहब! आपने अभी पूछा कि मैं कौन हूँ? और इन साहब ने आपको बताया भी, लेकिन शायद ये आपको पूरी हकीकत बताना भूल गए। इन्होंने सच कहा कि मैं ‘जिराती’ हूँ। लेकिन मैं इनका नौकर नहीं हूँ… मैं उस माँ का जिराती हूँ जिसने इन्हें जन्म दिया है। उस माँ की ममता रूपी ज़मीन को अपने खून-पसीने से सींचकर मैंने ये ‘फसल’ तैयार की थी, जिसे आप आज ‘साहब’ कह रहे हैं। असलियत तो ये है कि मैं खेती तो करता हूँ, मगर इनका नहीं, इनकी माँ की उम्मीदों का जिराती हूँ।”
इतना कहकर सखाराम ने एक पल भी वहाँ इंतज़ार नहीं किया। वह अपनी फटी चप्पलों की आवाज़ के साथ तेज़ी से सीढ़ियों से उतरा और भीड़ में ओझल हो गया। पीछे छोड़ गया एक ऐसा सन्नाटा, जो आकाश के वजूद को चीर रहा था।
आकाश के दोस्त कभी आकाश के शर्म से झुके चेहरे को देखते, तो कभी उस जाते हुए ‘जिराती’ को, जिसने पल भर में शहर की उस महँगी इमारत की औकात दिखा दी थी। आकाश अब किसी फंक्शन में जाने लायक नहीं बचा था। उसे मालूम था कि अब वह चाहे कितनी भी सफाई दे दे, वह अपने दोस्तों की नज़रों में गिर चुका है। आज उसकी तरक्क़ी के सारे महल ढह गए थे, क्योंकि उसने जिस जड़ को ‘नौकर’ बताया था, वही उसका असली आधार थी। उस दिन एक बाप तो हार गया था, लेकिन एक ‘जिराती’ जीत गया था।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
