सामाजिक

जीवन की डोर

“गा  लो, मुस्कुरा लो, महफिलें सजा लो, क्योंकि जीवन की डोर बड़ी कमजोर है”

यह पंक्तियाँ मात्र शब्द नहीं बल्कि एक मुकम्मल फ़लसफ़ा हैं जो हमें इंसानियत, रूहानियत और इस क़ायनात की हक़ीक़त से रूबरू कराती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो ‘जीवन की डोर’ उन सूक्ष्म सांसों और रिश्तों का प्रतीक है जो हमें इस भौतिक जगत से बांधे हुए हैं, लेकिन यह डोर जितनी प्रत्यक्ष रूप से सुदृढ़ लगती है, वास्तविकता में उतनी ही नाज़ुक और क्षणभंगुर नश्वर है। यह हमें बोध कराती है कि प्रत्येक मनुष्य इस संसार में एक मुसाफ़िर की तरह है और यहाँ के तमाम रिश्ते-नाते, अपने पराए महज़ एक अस्थायी पड़ाव हैं। जब हम इस सत्य को हृदय से स्वीकार कर लेते हैं कि यह डोर अत्यंत कमज़ोर है, तब हमारे भीतर से संसार का मोह और व्यर्थ की चिंताएं समाप्त होने लगती हैं और हम उस सच्ची ख़ुशी की तलाश शुरू करते हैं जो समय की सीमाओं से परे है। रूहानियत या आध्यात्मिकता में मृत्यु कोई अंत नहीं बल्कि एक अनंत यात्रा का प्रारंभ है, जहाँ आत्मा अपने नश्वर शरीर के पिंजरे को छोड़कर परमात्मा के चरणों में विलीन हो जाती है। जिस प्रकार एक पतंग आकाश की ऊंचाइयों में तब तक लहराती है जब तक वह डोर से जुड़ी है, उसी प्रकार मनुष्य का अस्तित्व भी परमात्मा की इच्छा और कर्मों के अधीन है। डोर टूटने का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि अब आत्मा का इस मृगतृष्णा वाले संसार से नाता टूटकर अपने मूल स्रोत से जुड़ गया है। यह पंक्तियाँ हमें ‘वर्तमान’ में जीने का महान संदेश देती हैं; चूँकि जीवन का हर पल अनिश्चित है, इसलिए इसका सबसे श्रेष्ठ उपयोग यही है कि हम प्रेम बांटें, मुस्कुराहटें बिखेरें और खुशियों की महफिलें सजाएं। यही निस्वार्थ सेवा और प्रेम ही वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति है जहाँ मनुष्य स्वयं के दुखों से ऊपर उठकर दूसरों के लिए सुकून का कारण बनता है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि जीवन की नश्वरता से डरने के बजाय उसे सहजता से स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि जब हम अपनी जीवन रूपी डोर उस परमशक्ति सर्वशक्तिमान  इश्वर के हाथों में सौंप देते हैं, तो भय और व्याकुलता का स्थान अटूट विश्वास और शांति ले लेती है। संसार की यह चमक-धमक जिसे ‘माया’ कहा गया है, दरअसल आत्मा के विकास की एक पाठशाला है जहाँ हर सुख और दुख हमें परिपक्व बनाने के लिए आता है। अंततः, जीवन की कमज़ोर डोर का आध्यात्मिक निष्कर्ष यही है कि हम इस फ़ानी ख़त्म होजने वाली दुनिया में रहते हुए भी अपनी रूह की पाकीज़गी को बनाए रखें, अपने कर्मों में शुचिता लाएं और हर पल को परमात्मा का उपहार समझकर उल्लास के साथ जिएं। यह दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि ख़ुश रहना और दूसरों को ख़ुश रखना ही सबसे बड़ी इबादत है, क्योंकि जो डोर कमज़ोर है वही हमें उस ‘अमर’ शक्ति से जोड़ने का एकमात्र ज़रिया भी है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।