कविता

लिख तो सकता हूं

जानता हूँ तुम्हें गिला है
कि मैं तुम्हारे बारे में क्यों नहीं लिखता,
तुम्हारा चाहने वाला क्यों नहीं दिखता।

हाँ, लिख तो सकता हूँ—
तुम्हारे रूप, श्रृंगार और सौंदर्य पर,
भय, लोभ, लालच, मोह, दया और ऐश्वर्य पर,
मगर अब थक चुका हूँ
इन विषयों को दोहराने से।

मोह अब भी पूरी तरह छूटा नहीं,
पर कुछ नया सीखने की चाह जागी है।
इन सबके अलावा भी
लिखने को बहुत कुछ है।

कब तक लिखता रहूँ
वही चमत्कार, पाखंड और झूठ?
अब दिखते हैं मुझे
असली मुद्दे—
अशिक्षा, गरीबी, भूख और शोषण।

लिखना है—
कौन कर रहा है इनका पोषण,
क्यों अब भी जिंदा हैं
हजारों साल पुराने, बेकार नियम,
जिनके नीचे दबकर
आज भी सिसक रहे हैं लाखों लोग।

क्यों नहीं कर पा रहा आम नागरिक
अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग?
हक़, अधिकार और कर्तव्य
सबको बताना है,
अंतिम पायदान के व्यक्ति को
ऊपर उठाना है।

तुम नाराज़ मत होना, प्रिये,
तुम्हारी तारीफ़
रूबरू होकर कर दूँगा,
अभी मेरी कलम को
ज़रूरी मुद्दे लिखने दो।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554