कविता
अपने होने का हम कुछ इस तरह पता देते थे,
इतनी खामोशी में भी नाम तेरा जपा करते थे।
यूं हवा के झोंकों में तेरी ‘खुशबू’ ढूंढा करते थे,
तन्हाई में भी तुझसे खूब बातें किया करते थे।
रास्ते वहीं थे, तो कदम भी वहीं पड़ा करते थे,
हम तो हर मोड़ पर तेरा ही ‘इंतज़ार’ करते थे।
अपनी ‘आँखों’ में सपनों का शहर बसाया था,
सुबह सूरज निकलते ‘तुझे’ ही देखा करते थे।
अब मौज़ूदा वो ‘एहसास’ कहीं खो-सा गया है,
‘माज़ी’ हम जो थे वो भी जैसे बीत-सा गया है।
— संजय एम तराणेकर
