शाह समाज, विरासत वोकी गरिमा और सामाजिक भ्रांतियों का सच
मुस्लिम समाज में ‘शाह’ शब्द केवल एक कुल-नाम या उपनाम नहीं है, बल्कि यह एक ‘लक़ब’ (पदवी) है जो गौरवशाली इतिहास और महान आध्यात्मिक विरासत को समेटे हुए है। फारसी मूल का यह शब्द ‘बादशाह’ और ‘शासक’ का पर्याय है। विडंबना यह है कि जिस नाम का अर्थ ही सर्वोच्चता और प्रभुता हो, उसे समाज के कुछ हिस्सों में अज्ञानता वश कमतर आंका जाता है। यह आलेख इसी नाम के वास्तविक अर्थ और इसके साथ जुड़ी भ्रांतियों के विश्लेषण का एक प्रयास है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, बादशाहों और सूफियों का लक़ब
‘शाह’ शब्द का प्रयोग इतिहास में दो विशिष्ट श्रेणियों के लिए किया गया: दु
1- नियावी सत्ता,, मुग़ल बादशाहों से लेकर मध्य एशिया के शासकों तक, ‘शाह’ उनकी शक्ति और सल्तनत का प्रतीक था। (जैसे शेर शाह सूरी, नादिर शाह, शाहजहाँ)।
2- रूहानी सत्ता, सूफ़ी संतों और अल्लाह के वलियों ने जब दुनियावी दौलत को त्याग कर मानवता की सेवा का रास्ता चुना, तो दुनिया ने उन्हें ‘रूहानी बादशाह’ या ‘शाह-ए-विलायत’ के सम्मान से नवाज़ा। हज़रत वारिस अली शाह और हज़रत बुल्ले शाह जैसे महापुरुष इसके प्रमाण हैं।
‘शाह’ और ‘फ़कीर’ एक महान गलतफहमी
अक्सर समाज में यह सवाल उठता है कि क्या सभी शाह ‘फ़कीर’ होते हैं? यहाँ फ़क़ीरी के अर्थ को समझने की आवश्यकता है: आध्यात्मिक फ़क़ीरी, सूफ़ी परंपरा में फ़क़ीरी का अर्थ ‘भिखारी’ होना नहीं, बल्कि ‘बेनियाज़’ (सांसारिक लालच से मुक्त) होना है। यह वह अवस्था है जहाँ इंसान केवल खुदा का मोहताज होता है, बंदों का नहीं।
हिकारत का कारण- समय के साथ, इस समाज के कुछ लोग आर्थिक रूप से पिछड़ गए या उन्होंने पारंपरिक रूप से दुआ-तावीज़ और सेवा को अपनाया। समाज के संकुचित नज़रिए ने उनकी इस सेवा और सादगी को ‘मजबूरी’ समझ लिया, जबकि यह उनकी महान सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा था।
हिक़ारत की दृष्टि, सामाजिक अज्ञानता का परिचय
यदि कोई ‘शाह’ सरनेम को तुच्छ समझता है, तो यह उस व्यक्ति के मानसिक पिछड़ेपन को दर्शाता है। विरासत पर गर्व, जिस सरनेम का संबंध सीधे तौर पर इल्म (ज्ञान) और रूहानियत से रहा हो, वह कभी छोटा नहीं हो सकता।
श्रम की महत्ता- इस्लाम और मानवता में कोई भी पेशा छोटा नहीं होता, लेकिन शाह समाज ने हमेशा खुददार रहकर जीवन जीने को प्राथमिकता दी है।
क़लम और पेशा,,आधुनिक युग की नई पहचान – आज शाह समाज की नई पौध ने अपनी पहचान को फ़िर से परिभाषित किया है। अब ‘शाह’ केवल दुआओं तक सीमित नहीं हैं:
साहित्यिक योगदान- इस समाज ने साहित्य, गज़ल और लेखन में अपनी ‘क़लम की बादशाहत’ क़ायम की है। शब्दों के जादू से समाज को दिशा देना भी एक तरह की शहंशाहियत ही है।
पेशेवर उत्कृष्टता – चिकित्सा इंजीनियरिंग, और शिक्षा के क्षेत्र में इस समाज के लोग अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। एक ‘फार्मासिस्ट’ के रूप में दवाओं का ज्ञान रखने वाला शाह, या एक ‘लेखक’ के रूप में समाज का दर्द लिखने वाला शाह ये सभी आधुनिक दौर के वास्तविक कर्णधार हैं, प्रभावशाली पक्ष,,क्यों यह समाज विशिष्ट है?
सहनशीलता- तमाम सामाजिक भेदभाव के बावजूद, शाह समाज ने कभी अपनी उदारता और सादगी नहीं छोड़ी।
सांस्कृतिक एकता- यह समाज गंगा-जमुनी तहज़ीब का सबसे बड़ा रक्षक रहा है। सूफ़ी दरगाहों पर हर धर्म के लोग ‘शाह’ के दर पर सिर झुकाते हैं, जो इनकी सर्वव्यापकता का सबूत है।
स्वाभिमान- शाह होने का अर्थ ही है,अपने ख़ुद्दारी को न बेचना। चाहे आर्थिक स्थिति कैसी भी हो, एक शाह का व्यक्तित्व हमेशा प्रभावशाली और गरिमामय रहता है,
आत्म-सम्मान का आह्वान – शाह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने नाम पर गर्व होना चाहिए। यह नाम आपको याद दिलाता है कि आपके पूर्वज दिलों को जीतने वाले ‘बादशाह’ थे। समाज की ‘हिकारत’ का जवाब अपनी ‘काबलियत’ और ‘इल्म’ से देना ही सबसे बड़ी जीत है।
दौलत से कोई शाह नहीं होता, और सादगी से कोई फ़क़ीर नहीं बनता। शाह वो है जिसके किरदार की ख़ुशबू से ज़माना महक उठे।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
