वो ठूँठ
रास्तों के दोनों ओर
उग आए हैं वृक्ष हज़ारों।
अंबर छूने की आकांक्षा में,
वितान बन छा जाते हर बार।
हरी-भरी शाखों पर लताएँ,
झुककर ज़मीं को छूती हैं।
कोई फूलों से सजी हुई,
कोई हवाओं से बातें करती है।
इन्हीं में कभी-कभी दिख जाता
एक अकेला, निर्वस्त्र, निस्तब्ध,
पर्णहीन, मौन खड़ा ठूँठ-सा वृक्ष,
जैसे समय से किया हो समझौता।
क्या वो बस एक स्मृति है?
या अंबर से कर रहा गुहार?
नहीं, वह तो जीवन का साक्षी है
मौन में रचता कोई विचार।
वह कहता है
“घमंड मत कर अपने हरेपन पर,
कभी मैं भी ऐसा ही था।
कल तुझे भी ठहर जाना होगा,
सूनी शाखों में बदल जाना होगा।”
किन्तु प्रकृति की यही तो लीला
कभी एक भोर, एक नन्हा पत्ता,
उस ठूँठ की शाख पर उग आता है।
और वह वृक्ष फिर से जी उठता है,
जैसे नवविवाहिता सोलह शृंगार में।
यही है जीवन का चक्र
दिवस, रात्रि, पतझड़, वसंत,
उजाले और छाँव के बीच
प्रकृति गुनगुनाती रहस्यगाथा अनंत।
ठूँठ केवल सूखापन नहीं,
वह प्रतीक्षा है पुनः अंकुरण की।
और यह सत्य है
कि हर ठूँठ फिर हरा हो सकता है।
— सविता सिंह मीरा
