मजदूर
मैं श्रम का साथी, कहलाता हूं मजदूर
खून पसीना बहाकर हर काम को करता हूं दूर।
अपनी मिहनत की रोटी खाता हूं,
कभी को किसी को न दुख देता हूं और न सताता हूं।
खेतों में काम करके अन्न उपजाता हूं,
दो वक्त की रोटी खाकर रात में चैन की नींद सो जाता हूं।
हम वो प्राणी है जिसपे लोगों को है अभिमान,
अपने हर कर्मो से जग का करता हूं कल्याण।
देश की सरहद पे देश की सुरक्षा करते हैं जवान,
हम सरहद के पीछे अन्न उपजा कर लोगों का भरते हैं पेट और कहलाते हैं किसान।
खेतों के साथ रास्तों और भवनों के निर्माण में देता हूं अपनी श्रमदान,
देश में विकास का परचम लहराता हूं,इसका है मुझे अभिमान।
— मृदुल शरण
