कहानी

बाबा की रुख़सती और घर का सन्नाटा 

​जिस दिन बाबा इस ‘रोज़-ए-फ़ानी’ से विदा हुए, उस दिन आसमान पर घटाएं नहीं थीं, मगर घर के अंदर एक ऐसी धुंध छा गई थी जो दिखाई नहीं देती थी, बस महसूस होती थी। आँगन में पड़ी वह खाली ‘तख़्तपोश’ (लकड़ी की चौकी) चीख़-चीख़ कर उनके न होने का अहसास दिलाती। मरियम ने देखा कि बाबा की चप्पलें दरवाज़े पर वैसी ही पड़ी हैं, जैसे वह अभी मस्जिद से लौट आएंगे। पर हक़ीक़त यह थी कि अब उस घर की दहलीज़ को पार करने वाला कोई मर्द नहीं बचा था। माँ के आंसुओं ने उनकी आँखों की रोशनी और कम कर दी थी, और छोटी बहन ज़ुबैदा की मासूमियत अब एक अनकहे डर में बदल गई थी।​मरियम, जिसके हाथों में क़लम और शायरी की डायरियां शोभा देती थीं, अब उन हाथों में राशन की थैलियां और दफ़्तर की भारी फाइलें थीं। मुस्तक़बिल (भविष्य) की तरफ़ जाने वाला रास्ता कोई फ़ूलों की सेज़ नहीं, बल्कि तपती हुई सड़क थी। मरियम जब दफ़्तर से लौटती, तो उसके माथे पर पसीने की बूंदें नहीं, बल्कि वक़्त की मार की लकीरें साफ़ दिखतीं। वह रात-रात भर जागकर घर का हिसाब जोड़ती,”माँ की दवा, ज़ुबैदा की फीस, बिजली का बिल…”। उसकी अपनी ख़्वाहिशें कहीं अलमारी के सबसे नीचे वाले दराज़ में दब गई थीं।

​आमिर जब घर आता, तो वह हमदर्दी का ऐसा लबादा ओढ़कर आता जिसे देखकर फ़रिश्तों को भी इश्क़ हो। वह मरियम से कहता, “मरियम, तुम थक जाती हो, मैं हूँ ना।” मगर मरियम की गैर-मौजूदगी में वह ज़ुबैदा के कच्चे ज़हन में ज़हर घोल रहा था। मंज़र कुछ यूँ था कि जब मरियम धूप में जलकर घर लौटती, आमिर और ज़ुबैदा आँगन के साए में गुफ़्तगू कर रहे होते। मरियम ने आमिर के चेहरे पर वह मुस्कुराहट देखी थी जो अब उसके लिए नहीं, बल्कि ज़ुबैदा के लिए थी। आमिर के चेहरे से वफ़ा का नकाब धीरे-धीरे सरक रहा था, मगर मरियम ने इसे अपनी थकान का वहम समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया।

​वह शाम मरियम कभी नहीं भूल सकती। लिफ़ाफ़ा खोलते ही उसके हाथों से चाय का कप छूटकर टुकड़े-टुकड़े हो गया। तस्वीरों में मंज़र साफ़ था,वही आमिर जो मरियम के सामने ‘परहेज़गार’ बनता था, ज़ुबैदा को अपनी बाहों में समेटे उसे सुनहरे ख़्वाब दिखा रहा था। आमिर के ख़त की इबारत मरियम के वज़ूद पर कोड़ों की तरह पड़ रही थी, “तुम्हारी बाजी अब उम्र की उस दहलीज़ पर हैं जहाँ सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, जज़्बात नहीं। हम अपनी दुनिया अलग बसाएंगे।” मरियम को लगा जैसे किसी ने उसका दिल मुट्ठी में भींच लिया हो।

​रात के अंधेरे में जब आमिर आया, तो मरियम ने दीये की मद्धम रोशनी में उसकी आँखों में झांका। वहाँ अब मोहब्बत नहीं, बल्कि एक शातिर शिकारी की चमक थी। जैसे ही मरियम ने तस्वीरें मेज़ पर रखीं, आमिर का ‘हमदर्द’ वाला चेहरा फ़ौजी शिक़स्त की तरह बिख़र गया। वह हड़बड़ाया, बहाने बनाए, मगर उसकी आवाज़ में वह दम नहीं था।

​उधर ज़ुबैदा ने जब अपनी अप्पी की आँखों में मौत जैसा सन्नाटा देखा, तो उसका रोम-रोम कांप उठा। उसे याद आया कि कैसे इसी अप्पी ने अपनी नयी साड़ी छोड़कर उसे स्कूल की ड्रेस दिलाई थी। उसे अपनी बाजी का वह चेहरा याद आया जो रात भर जागकर उसकी पढ़ाई की निगरानी करता था। वह आमिर की बाहों के घेरे से निकलकर मरियम के चरणों में ढेर हो गई।

​मरियम ने आमिर को उस घर से ऐसे निकाला जैसे दूध में से मक्खी। उसने आमिर से कहा, “तुमने सोचा था कि तुम एक कमज़ोर औरत को धोख़ा दे रहे हो, पर तुमने उस रूह को ललकारा है जिसने अपनों के लिए ख़ुद को फ़ना कर दिया।”

​आमिर के जाने के बाद ज़ुबैदा का दिल पूरी तरह बदल चुका था। वह अपनी अप्पी के हाथों को चूमकर रोने लगी। मरियम ने उसकी आँखों के आँसू पोंछे और खिड़की से बाहर देखा,सूरज ढल चुका था, पर चाँद की एक मद्धम सी किरण आँगन में उतर रही थी। मुस्तक़बिल की राह अब भी तन्हा थी, मगर साफ़ थी। अब मरियम के साथ उसकी बहन का वह पुराना प्यार लौट आया था, जो किसी भी फरेबी आमिर से कहीं ज़्यादा क़ीमती था।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़  

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।