मौन अधर
मौन अधर हैं, पलकें बोझिल,
प्रेम अनावृत धार रहा,
स्वार्थ-पूर्ण इस मरु-दुनिया में,
दिव्य-स्नेह विस्तार रहा।
प्रिय की एकाग्रता अनूठी,
शब्दहीन संधान करे,
नित निष्काम भाव का उसका,
मुझ पर ही कल्याण करे।
मौन तड़प यह शब्दहीन है,
अंतर्मन को खोल रही,
विमल चेतना इस विरहन की,
नस-नस में अब डोल रही।
तजूँ कामना अब निर्वाण की,
बस तव रूप निहारूँ मैं,
तू ही अधिष्ठान, तू ही ईश्वर,
सर्वस्व तुझ पर वारूँ मैं।
तृप्ति आत्मिक मिली मुझे अब,
मोक्ष-चाह भी शेष नहीं,
पूर्ण हुई मैं प्रिय-रंग रँगकर,
रहा द्वैत का लेश नहीं।
— सविता सिंह मीरा
