लिव इन में होगी निराशा
जब रिश्तों की राहों में, सवाल कई उठते हैं,
दिल की खामोशी में, कुछ जवाब छुपते हैं।
साथ चलना अगर दोनों की ‘मर्ज़ी’ से ही हो,
तो क्यों फिर रिश्तों पर इल्ज़ाम ये जुड़ते हैं?
वो पल जो थे अपने, मुस्कान से ही तो सजे,
क्यों? वक्त के संग, आरोपों के सांचे में ढले?
ये प्यार अगर सच्चा था, समझ भी साथ हो,
दर्द की कहानी क्यों बन के रिश्ता ख़ाक हो?
सहमति का मतलब, सम्मान की पक्की डोर,
न कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती, न मन पे कोई ज़ोर।
जहाँ दोनों की इच्छा, बराबरी से ‘दिल’ मिले,
वहीं तो रिश्ते खिलते हैं, जैसे सावन के झूले।
आओ समझें हम, दिल से दिल की ये भाषा,
युवतियों लिव-इन में ना रहना होगी निराशा।
रिश्ते हैं नाज़ुक, इन्हें शादी से सहेजना सीखें,
सच और विश्वास से, ‘जीवन यात्रा’ को सींचें।
(संदर्भ – सहमति से लिव-इन है तो ये यौन उत्पीड़न का अपराध कैसे? – जस्टिस नागरत्ना)
— संजय एम तराणेकर
