कविता

चौपाई

चौपाई 

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उसने शीश हाथ जब फेरा।

मुखमंडल मुस्कान बिखेरा।।

छोटी को इससे क्या लेना।

माँ बन खिला रही जब छेना।।

आओ मिलकर शोर मचाएं।

हंँसे  हँसाएँ  और  रुलाएँ।।

नव  जीवन  सौगातें  बाँटें।

भूल  जाइए  चुभते काँटे।।

इतना तो नादान नहीं हो।

वही गलत या आप सही हो।।

व्यर्थ नहीं तकरार कराओ।

सदा मान- सम्मान दिलाओ।।

ममता  देती  माँ  के  जैसी।

जब-तब बिल्कुल दिखती वैसी।।

फिर भी भूल नही तुम जाना।

हिटलर  लगते  उसके  नाना।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921