स्कूल की चौखट पर खड़ा बाजार, भीतर सिमटती शिक्षा
निजी विद्यालयों में एनसीईआरटी पुस्तकों के अनुपालन का सवाल अब महज़ पाठ्य सामग्री का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह देश की शिक्षा व्यवस्था के चरित्र की परीक्षा बन चुका है। जब एक ओर कानून स्पष्ट दिशा देता हो और दूसरी ओर संस्थान स्वार्थवश उससे भटकें, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि नैतिक विचलन का संकेत होता है। अप्रैल 2026 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा केंद्र, सीबीएसई और सभी राज्यों को जारी नोटिस ने इस विडंबना को उजागर किया है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या शिक्षा का अधिकार कानून केवल औपचारिक घोषणा बनकर रह गया है, या उसे लागू करने की प्रतिबद्धता ही क्षीण हो गई है। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि शिक्षा में समानता का मूल सिद्धांत निरंतर दबाव और उपेक्षा के बीच संघर्ष कर रहा है।
शिक्षा का अधिकार कानून 2009 की धारा 29 ने स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया था कि प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा 1 से 8) में पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों का निर्धारण एनसीईआरटी या संबंधित एससीईआरटी द्वारा किया जाएगा। इसी सोच के तहत एनसीईआरटी और एससीईआरटी को पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों के निर्धारण का अधिकार सौंपा गया। इन संस्थाओं द्वारा तैयार पुस्तकें न केवल शैक्षणिक रूप से संतुलित और विश्वसनीय होती हैं, बल्कि आम परिवारों के लिए किफायती भी रहती हैं। इसके विपरीत, निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें इस मूल उद्देश्य को कमजोर करती हैं। जब एक ही कक्षा की पुस्तकों पर हजारों रुपये खर्च होने लगें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शिक्षा अब अधिकार से ज्यादा एक लाभकारी व्यापार में बदलती जा रही है।
निजी विद्यालयों में महंगी पुस्तकों को अनिवार्य बनाना कोई आकस्मिक भूल नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित आर्थिक तंत्र की ओर संकेत करता है। कई स्थानों पर स्कूल और प्रकाशक मिलकर ऐसा गठजोड़ रचते हैं, जिसमें शिक्षा का उद्देश्य पीछे छूट जाता है और मुनाफा केंद्र में आ जाता है। अभिभावकों को “उच्च गुणवत्ता” और “अधिक उपयोगी सामग्री” का हवाला देकर इन पुस्तकों को खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है, जबकि इन दावों की ठोस पुष्टि प्रायः नहीं होती। इस पूरी प्रक्रिया में अभिभावकों की विवशता का व्यवस्थित दोहन होता है और वे विरोध करने में असहाय महसूस करते हैं। ऐसी प्रवृत्ति शिक्षा के नैतिक आधार को कमजोर करती है और संस्थागत विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
सबसे चिंताजनक परिणाम एक तेजी से गहराते शिक्षा-विभाजन के रूप में सामने आता है। जहां सरकारी विद्यालयों के बच्चे सस्ती, मानकीकृत और समान पुस्तकों से पढ़ते हैं, वहीं निजी स्कूलों के छात्र महंगी और अलग सामग्री पर निर्भर होते हैं, जिससे उनके ज्ञान का आधार ही भिन्न बन जाता है। यही अंतर आगे चलकर अवसरों की खाई को और चौड़ा कर देता है। मध्यम और निम्न वर्गीय परिवार पहले से ही शिक्षा पर बढ़ते खर्चों का दबाव झेल रहे हैं, ऐसे में किताबों का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उनके लिए बेहद असहनीय हो जाता है। यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता को नहीं बढ़ाती, बल्कि समाज में गहराते असंतुलन और विभाजन को भी और मजबूत करती है।
इस पूरे परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पहल एक महत्वपूर्ण और समयोचित हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है, जिसने शिक्षा के अधिकार को मानवाधिकार के व्यापक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता को और स्पष्ट किया है। अनावश्यक तथा भारी-भरकम पुस्तकों का बढ़ता बोझ बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, जो राष्ट्रीय स्कूल बैग पॉलिसी 2020 की मूल भावना के विपरीत है। यदि राज्य सरकारें और संबंधित संस्थाएं अब भी इस मुद्दे पर उदासीन बनी रहती हैं, तो यह केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्वों की स्पष्ट उपेक्षा मानी जाएगी। इसलिए इस विषय को अब सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ठोस और प्रभावी कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।
अकादमिक स्वायत्तता का तर्क अक्सर इस व्यवस्था को सही ठहराने के लिए दिया जाता है, पर इसकी वैधता तभी तक है जब तक वह कानून की सीमाओं में रहे। जब विधि स्पष्ट रूप से तय करती है कि पाठ्यपुस्तकों का चयन किन संस्थाओं के अधिकार में होगा, तब उस सीमा का उल्लंघन स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अनुशासनहीनता का संकेत है। एनसीईआरटी की पुस्तकें विशेषज्ञों द्वारा राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के अनुरूप तैयार होती हैं, जिससे उनकी विश्वसनीयता सिद्ध होती है। इसके विपरीत, निजी प्रकाशनों में आकर्षण अधिक, पर सामग्री की प्रमाणिकता पर सवाल बने रहते हैं। ऐसे में अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देना शिक्षा की मूल भावना के विरुद्ध है।
अब समय महज़ चर्चा का नहीं, ठोस और निर्णायक हस्तक्षेप का है। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक पारदर्शी, कड़ा और जवाबदेह निगरानी तंत्र विकसित करना होगा, जो कागज़ों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर प्रभावी दिखे। निजी विद्यालयों की पुस्तक सूचियों का नियमित, निष्पक्ष और व्यापक ऑडिट सुनिश्चित किया जाए, तथा नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों पर सख्त और उदाहरणात्मक कार्रवाई हो। जुर्माने से लेकर मान्यता रद्द करने तक के प्रावधानों को पूरी दृढ़ता के साथ लागू करना अनिवार्य है। साथ ही अभिभावकों को जागरूक और सशक्त बनाना होगा, ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग रहें और किसी भी अनावश्यक आर्थिक बोझ के विरुद्ध निर्भीक होकर आवाज उठा सकें।
आखिरकार यह प्रश्न केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य और उसकी सामाजिक दिशा से गहराई से जुड़ा है। शिक्षा वही मजबूत आधार है जिस पर एक संतुलित और न्यायपूर्ण समाज की इमारत खड़ी होती है, और यदि इसी आधार में असमानता की दरार पड़ जाए, तो समावेशी विकास का सपना अधूरा रह जाता है। समान पाठ्य सामग्री सिर्फ शैक्षणिक जरूरत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अवसर की समानता का एक अहम स्तंभ है। अब सरकार और समाज—दोनों के सामने यह स्पष्ट विकल्प है कि शिक्षा को बराबरी का सेतु बनाया जाए या उसे विभाजन की खाई में बदलने दिया जाए।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
