ज़रा अपने भीतर झाँक के देखो
ज़रा अपने भीतर झाँक के देखो,
कितने ग़म हैं उन्हें बाँट के देखो।
न रहो ख़ामोश न अंदर ही यूँ घुटो,
शोर भावनाओं का समंदर सा सुनो।
चेहरे के भाव भी सब समझा रहे हैं,
किसी उधेड़बुन में हो ये बता रहे हैं।
खोलो कपाट ह्रदय के सैलाब बहेगा,
चुप रहने से बस अंतर्मन ही जलेगा।
मुस्कुराओ कि ज़िन्दगी ये संघर्ष है,
सुख-दुख तो आते जाते हर वक्त हैं।
ज़िन्दगी अनमोल न इसे ज़ाया करो,
खुद की कमियां खंगालो आगे बड़ो।
— कामनी गुप्ता
