पुस्तक समीक्षा

प्रेम और मानवीय संबंधों का ‘सारंग राग’

एकल संग्रहों की श्रृंखला में एक और संग्रह का प्रवेश हुआ है, और यह है होनहार युवा कवयित्री अनुराधा प्रियदर्शिनी के ‘सारंग राग’ का।जो संवेदनाओं की स्वर लहरी जैसा है, जिसमें समूचा जीवन-दर्शन परिलक्षित होता है।

संग्रह की रचनाएँ मन के तारों को झंकृत करते हुए पाठकों को स्वयं में झाँकने को विवश करने की कोशिश करती हैं।
‘झरोखे से’ वरिष्ठ कवि/संपादक और हिमकिरीट संग्रह के रचनाकार भूपेश प्रताप सिंह प्रस्तुत संग्रह के बारे में लिखते हैं कि ‘संग्रह का महत्वपूर्ण पक्ष है- प्रेम और मानवीय संबंधों की व्याख्या।
जबकि ‘आमुख’ में डा. रवींद्र कुमार का मत है कि संग्रह में आध्यात्मिकता के साथ सनातन का पुट, सौंदर्य, प्रेम, ज्ञान, विवेक की झलक के साथ नूतनता का समन्वय स्थापित करने का सुंदर प्रयास किया गया है।
शुभकामनाओं के साथ पूर्व वरिष्ठ अधिकारी, गीतकार, आध्यात्मिक प्रवक्ता डा. अभि दा का मानना है कि प्रस्तुत संग्रह की रचनाओं के प्रस्तुतीकरण में मानवीय स्तरों से कहीं ऊपर की विशेषज्ञता दृष्टिगोचर होती है।
वरिष्ठ गीतकार/संगीतकार पद्मधर झा शर्मा (जिन्होंने अनुराधा प्रियदर्शिनी की अनेक रचनाओं को अपने स्वर-संगीत से प्रस्तुत किया है) कहते हैं कि मैंने गुनगुनाते हुए संग्रह की रचनाओं का अध्ययन करते हुए कवयित्री की कठोर साधना को महसूस किया है।
‘लेखक की कलम से’ कवयित्री स्वयं बताती है कि संग्रह में भक्ति, जीवन, प्रेम और प्रकृति संबंधित 61 रचनाएं शामिल हैं।

कवयित्री का जीवन परिचय यूँ तो संक्षिप्त रूप में ही है, पर उनकी साहित्य साधना की अभिरुचि और समर्पण का परिचायक है।
यूँ तो संग्रह की लगभग सारी रचनाएं अपने आप में विशेष हैं , सबके बारे यहाँ लिख पाना न तो संभव है और न ही न्यायोचित। फिर भी कुछेक रचना की कुछ पंक्तियाँ जरुर उद्धृत करना चाहूँगा। यथा-

तीर्थराज प्रयाग की ये पंक्तियां सनातनी संदेश का पर्याय बनती प्रतीत होती हैं-

तीर्थ राजा कहे जो गये।
घाट धारा त्रिवेणी भये।।
हैं बुलाते चले आइए।
पाप धो पुण्य को पाइए।।

स्नेह का दीप जलाने का आवाहन करते हुए अनुराधा की ये पंक्तियां मन को छू जाती हैं –

स्नेह का दीप निशदिन जलाते रहो।
द्वेष की भावना को मिटाते रहो।।

ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को शब्द चित्र के माध्यम से उकेरते हुए कवयित्री महसूस करती है कि –

प्रभु जी सबके पालनकर्ता, भर दें जीवन प्राण।
एक झलक जो मिल जाए तो, हो सबका कल्याण।।
जीवन मरण का चक्र छुटता, मिल जाता निर्वाण।
विपदा घोर बहुत आयी है, हृदय हुए पाषाण।।

राष्ट्रभाषा की मांग है हिंदी में कवयित्री बेसिक अंदाज में अपनी भावनाओं से जोड़ने का प्रयास करते हुए कहती है-
निज भाषा उन्नति से ही, उन्नत होगा देश।
दुनिया को अब दे दो राष्ट्र भाषा हिंदी का संदेश।।

यह जीवन उपहार में अपने एक दोहे के माध्यम से सीधे सपाट अंदाज में कवयित्री आम जन को जगाने का दायित्व निभाने की कोशिश भी कहती है –

भूल गया इंसान क्यों, करता नहीं है शर्म।
जात-पात से है बड़ा मानवता का धर्म।।

वैदिक प्रकाशन से प्रकाशित ‘सारंग राग’ काव्य संग्रह की रचनाएँ जहाँ अपने स्पष्ट कथ्य का निर्वाह करती हैं, वहीं उनमें तरल प्रवाह भी है, जो पाठकों को बांधे रखने की क्षमता रखती है। जिससे पाठक की उत्सुकता, पठनीय भावना और आगे क्या कुछ और बेहतर की उत्कंठा प्रबल होगी। जिसे कवयित्री की सफलता का सूत्र कहना ग़लत नहीं होगा।
संक्षेप में कहा जाए तो सारंग राग उन पाठकों के लिए कहीं अधिक विशेष है, जो मानवीय संबंधों, संवेदनाओं के ISBN 788199 947450
प्रकाशन वैदिक प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष 2026
मुल्य 199₹

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921