जिमि छोड़िकें नवजात शिशु! (ब्रज)
जिमि छोड़िकें नवजात शिशु,
जाबत चरन धेनु बिपिन;
तिमि काम पर जाबत युवति,
आ वत्स कूँ देखन चहति!
मन मारि कें जानो पड़त,
सोचति रहत वो का करत;
कैसे रहत खाबत पिबत,
सोबत जगत रोबत हँसत!
बलिहारी हर छवि पै रहत,
बिसरत न पाबत उर कबहु;
करतब हरेक देखन चहत,
परवश जगत जानौ पड़त!
आनन्द स्मित छवि लसत,
वारी रहत माँ सुधि करत;
हर शब्द गति स्मृति रहत,
सब छोड़ि संग खेलने चहत!
वैसे ईं प्रभु जीवन चहत,
लीला हरेक उनकी लखत;
दै ध्यान ‘मधु’ माधव तकत,
कोऊ न काहू छोड़न चहत!
— डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
