कविता

जिमि छोड़िकें नवजात शिशु! (ब्रज)

जिमि छोड़िकें नवजात शिशु,
जाबत चरन धेनु बिपिन;
तिमि काम पर जाबत युवति,
आ वत्स कूँ देखन चहति!

मन मारि कें जानो पड़त,
सोचति रहत वो का करत;
कैसे रहत खाबत पिबत,
सोबत जगत रोबत हँसत!

बलिहारी हर छवि पै रहत,
बिसरत न पाबत उर कबहु;
करतब हरेक देखन चहत,
परवश जगत जानौ पड़त!

आनन्द स्मित छवि लसत,
वारी रहत माँ सुधि करत;
हर शब्द गति स्मृति रहत,
सब छोड़ि संग खेलने चहत!

वैसे ईं प्रभु जीवन चहत,
लीला हरेक उनकी लखत;
दै ध्यान ‘मधु’ माधव तकत,
कोऊ न काहू छोड़न चहत!

— डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’

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