कविता

बेटियों से दुराव

आज वृद्ध माँ की मन, देर रात तक
बहुत कचोटती रही,
जो सदैव सूत की चाह किये।
बेटी की उपेक्षा
और कुलदीपक की इच्छा ने
एक-दो नहीं, तीन-तीन सुपुत्र लिये
पर दुहिता की अनिप्सा ने
आज इस दशा में पहुॅंचा दिया है
तृतीय तनय होने पर भी
एकाकी और विलग हो गई है
प्राणेश का शिथिल देह
सृजित गृह के कण-कण से स्नेह
ऐसे में अलग रहना
बुढ़ापे में दुःख-पीड़ा सहना
स्वयं ही घरेलू काज करना
मौन होकर आहें भरना,
ऐसे में एक प्यारी बेटी की कमी
स्मरण दिलाती है
बेटों की चाह,बेटियों से दुराव
रह-रहकर सताती,कर्मो की सजा पाती है।।

— चन्द्रकांत खुंटे क्रांति

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)

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