विरासत विरुद्ध विकास नहीं, विरासत सहित विकास चाहिए
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है। यह ऋषियों की तपोभूमि, देवालयों की धरा, परंपराओं की परिक्रमा और संस्कृति की चेतना से निर्मित एक जीवंत सभ्यता है। यहाँ मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं होते, बल्कि वे समाज की आत्मा, इतिहास की स्मृति और आस्था की ऊर्जा के केंद्र होते हैं। यही कारण है कि जब कहीं किसी प्राचीन मंदिर के टूटने, हटाए जाने या उपेक्षित होने की खबर सामने आती है, तो करोड़ों सनातनियों के मन में स्वाभाविक पीड़ा उत्पन्न होती है। तेलंगाना के वारंगल में कथित रूप से प्राचीन शिव मंदिर के अवशेषों को हटाकर स्कूल निर्माण की खबर ने भी ऐसी ही भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है।
यह विषय केवल एक मंदिर या एक निर्माण परियोजना का नहीं है। यह प्रश्न उस मानसिकता का है, जो विकास और विरासत को आमने-सामने खड़ा कर देती है। सनातन दृष्टि कहती है कि विकास आवश्यक है, शिक्षा भी अनिवार्य है, लेकिन अपनी जड़ों को काटकर किया गया विकास अंततः समाज को खोखला बना देता है।
सनातन परंपरा में मंदिरों का महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं रहा। प्राचीन भारत में मंदिर शिक्षा, कला, संगीत, विज्ञान, दर्शन और सामाजिक संगठन के केंद्र हुआ करते थे। दक्षिण भारत के अनेक मंदिरों में गुरुकुल चलते थे। काशी, उज्जैन, कांचीपुरम और नालंदा जैसी परंपराएँ केवल पुस्तकालयों से नहीं, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना से विकसित हुई थीं। ऐसे में यदि किसी प्राचीन मंदिर के स्थान पर स्कूल बनाने की बात कही जाती है, तो सनातनी समाज स्वाभाविक रूप से पूछता है कि क्या शिक्षा और संस्कृति को परस्पर विरोधी मान लिया गया है?
यह भी विचारणीय है कि भारत में हजारों एकड़ सरकारी भूमि, खाली भवन और अनुपयोगी परिसर उपलब्ध हैं, फिर क्यों बार-बार धार्मिक या सांस्कृतिक स्थलों के आसपास ही विकास परियोजनाएँ विवादों में आती हैं? यदि किसी स्थान पर वास्तव में ऐतिहासिक या धार्मिक महत्व की संरचना मौजूद थी, तो निर्माण शुरू करने से पहले पुरातत्व विभाग, इतिहासकारों और स्थानीय समाज से विस्तृत चर्चा क्यों नहीं की गई?
सनातन समाज की पीड़ा इसलिए भी गहरी है क्योंकि इतिहास में उसने अपने असंख्य मंदिरों को टूटते देखा है। विदेशी आक्रमणों के दौरान सोमनाथ से लेकर काशी और मथुरा तक असंख्य देवालय ध्वस्त किए गए। उन घटनाओं की स्मृति आज भी सामूहिक चेतना में जीवित है। ऐसे में जब आधुनिक भारत में भी किसी मंदिर के टूटने की खबर आती है, तो वह केवल वर्तमान घटना नहीं रहती, बल्कि वह ऐतिहासिक पीड़ा को भी पुनर्जीवित कर देती है।
कुछ लोग इस विषय को केवल राजनीति से जोड़कर देखते हैं, लेकिन यह समझना होगा कि सनातनी समाज के लिए मंदिर राजनीति का नहीं, अस्तित्व का विषय है। जिस प्रकार किसी समुदाय की भाषा, पोशाक या पवित्र ग्रंथ उसकी पहचान होते हैं, उसी प्रकार मंदिर सनातन सभ्यता की पहचान हैं। यदि इन प्रतीकों के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाएगी, तो समाज में अविश्वास और असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
हालाँकि सनातन दृष्टि अंध-विरोध की नहीं है। सनातन धर्म सदैव संतुलन और समन्वय की बात करता है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना रखने वाला समाज शिक्षा का विरोध कैसे कर सकता है? भारत की परंपरा तो “सा विद्या या विमुक्तये” कहती है। अर्थात् विद्या वह है जो मुक्ति दे। इसलिए कोई भी सनातनी स्कूल निर्माण का विरोध केवल इसलिए नहीं करेगा कि वहाँ शिक्षा दी जाएगी। वास्तविक चिंता यह है कि क्या विकास के नाम पर हमारी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहरों की उपेक्षा की जा रही है?
यदि किसी स्थान पर प्राचीन मंदिर के अवशेष मिलते हैं, तो आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए कि वहाँ पहले विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन हो। यदि संभव हो तो निर्माण योजना में बदलाव कर मंदिर को सुरक्षित रखा जाए। दुनिया के अनेक देशों में ऐसा होता है। यूरोप में हजारों वर्ष पुराने गिरजाघरों और स्मारकों को आधुनिक शहरों के बीच संरक्षित रखा गया है। मिस्र अपने पिरामिडों को बचाता है। कंबोडिया अंगकोरवाट को अपनी राष्ट्रीय पहचान मानता है। फिर भारत अपने मंदिरों को केवल “बाधा” के रूप में क्यों देखे?
सनातन दृष्टिकोण यह भी कहता है कि विकास तभी सार्थक है जब वह समाज को अपनी जड़ों से जोड़े। यदि नई पीढ़ी को केवल आधुनिक शिक्षा मिले लेकिन अपनी सभ्यता, इतिहास और परंपरा का ज्ञान न मिले, तो वह तकनीकी रूप से सक्षम होकर भी सांस्कृतिक रूप से रिक्त हो जाएगी। मंदिरों का संरक्षण केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रनिर्माण का कार्य है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें “विरासत सहित विकास” की नीति अपनाएँ। यदि किसी क्षेत्र में प्राचीन मंदिर या ऐतिहासिक संरचना है, तो उसे परियोजना का हिस्सा बनाया जा सकता है। स्कूल के साथ एक विरासत संग्रहालय बनाया जा सकता है। विद्यार्थियों को स्थानीय इतिहास पढ़ाया जा सकता है। इससे शिक्षा भी होगी और संस्कृति भी बचेगी।
सोशल मीडिया के इस दौर में एक और खतरा सामने आया है। आधी-अधूरी जानकारी और भावनात्मक पोस्ट समाज को तेजी से विभाजित कर देती हैं। कई लोग बिना तथ्य जाँचे उत्तेजित हो जाते हैं, जबकि कुछ लोग हर धार्मिक चिंता को “कट्टरता” कहकर खारिज कर देते हैं। दोनों ही दृष्टिकोण उचित नहीं हैं। आवश्यकता शांत, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील संवाद की है।
यह भी सच है कि कई बार प्रशासनिक लापरवाही विवाद को बढ़ा देती है। यदि शुरू से ही स्थानीय समाज को विश्वास में लिया जाए, पुरातत्व विशेषज्ञों की राय सार्वजनिक की जाए और पारदर्शिता रखी जाए, तो ऐसे विवादों को काफी हद तक टाला जा सकता है। दुर्भाग्य से अक्सर निर्णय ऊपर से थोपे हुए प्रतीत होते हैं, जिससे लोगों में असंतोष उत्पन्न होता है।
सनातन समाज आज यह अपेक्षा करता है कि भारत की सरकारें और संस्थाएँ केवल आर्थिक विकास को ही प्रगति का मापदंड न मानें। सभ्यता का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि आने वाली पीढ़ियाँ अपने प्राचीन मंदिरों, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को केवल तस्वीरों में देखेंगी, तो यह आधुनिक भारत की बड़ी विफलता होगी।
भारत विश्वगुरु तभी बन सकता है जब वह आधुनिकता और परंपरा दोनों को साथ लेकर चले। केवल कंक्रीट के भवन बना देने से राष्ट्र महान नहीं बनता। राष्ट्र तब महान बनता है जब उसकी आत्मा सुरक्षित रहे। मंदिर उसी आत्मा के प्रतीक हैं।
इसलिए आवश्यकता किसी टकराव की नहीं, बल्कि संवेदनशील समन्वय की है। स्कूल भी बनें, विश्वविद्यालय भी बनें, अस्पताल भी बनें, उद्योग भी लगें, लेकिन साथ ही भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहरें भी सुरक्षित रहें। यही सनातन दृष्टि है, यही संतुलित राष्ट्रवाद है और यही भारत की वास्तविक पहचान भी है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
