हास्य-व्यंग्य : पति ने बदला अपना सुर
जब से बृजमोहन की शादी हुई है। उनके अंदर संस्कार आ गये हैं। पत्नी के सामने अदब से रहने लगे हैं। चेहरे पर ऐसे गंभीर भाव रखने लगे हैं जैसे वे संस्कृत साहित्य के प्रकांड विद्वान हैं। सधे हुये वाक्यों का प्रयोग शुरू कर दिये हैं। उनकी पत्नी ने समझा कि ऐसे महान विद्वान को पाकर वह धन्य हो गयी है।
पहले झूठ का पुलिंदा होंठों पर रहता था लेकिन अब सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र हो गये हैं। जुबां पर एक शब्द असत्य नहीं। पत्नी को पूर्ण यकीन हो गया कि यह बंदा सत्य का पुजारी है। सत्ता को भी लात मार सकता है। सत्य का खून रगों में प्रवाहित हो रहा है।
आजकल वह सुमधुर आवाज में बात करता है। कर्कश आवाज अब नहीं निकलती। जैसे संगीत होंठों पर विराजमान है। मां सरस्वती का पूर्ण आशीर्वाद है। अब वह मारपीट वाले शब्द उनके शब्दकोश में नहीं हैं। बिल्कुल शांत रस में डूबा रहता है।
अब सारे वस्त्र साफ सुथरा पहनने लगे हैं। बालों को सदैव काला रखने लगे हैं ताकि पत्नी को ज्यादा उम्र होने का एहसास न हो। क्लीन शेव रखने लगे हैं। बिना इस्त्री किये वह अब कपड़ा नही पहनता है। आंखों में सुरमा उनके चेहरे की अब शान है।
आखिर यही बृजमोहन एक नंबर का आवारा था। मां-बाप को कसैले शब्दों से नवाजता रहता था। शादी के बाद से वह अपने माता-पिता को संपूर्ण तीर्थों का भगवान समझने लगा है। संस्कार और संस्कृति कभी जाना ही नहीं लेकिन अचानक आये बदलाव से लोग बड़े संकट में हैं।
पत्नी को पूर्ण एहसास है कि उसकी संपूर्ण मनोकामना पूर्ण हो गयी है। सातों जन्म तक साथ बना रहे यही बेचारी की निजी इच्छा है। ऐसा होनहार पति जिसको मिल जाये वह पत्नी अपने आप को बहुत खुश समझेगी। पति ने अपना सुर बदल लिया है। अब वह पत्नी की नजरों में श्रेष्ठ हो गया है।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
