हत्या का कलंक न लगे रिश्तों में
रिश्तों की डोर
धीरे-धीरे टूटे,
शब्दों की मार।
मन के आँगन
विश्वास के दीपक
क्यों बुझ जाते।
चेहरे हँसते,
भीतर मौन हिंसा
घर बना लेती।
क्रोध की आँच
रक्त नहीं बहाती,
मन जला देती।
रिश्तों के बीच
संदेह का बीज ही
काँटे उगाए।
ममता का वृक्ष
कटता नहीं हथियार से,
उपेक्षा से कटे।
सूखी आँखें
कई हत्याएँ सहकर
पत्थर बनतीं।
शब्दों का विष
धीरे-धीरे रिश्तों
का श्वास हर ले।
मनुष्य जीते
पर करुणा मर जाए,
कौन बचेगा।
स्नेह बचाना
युद्ध जीतने से भी
अधिक कठिन है।
हत्या न हो
विश्वासों की भीतर,
रिश्ते जीवित।
प्रेम की मिट्टी
कलंक से बच जाए,
यही प्रार्थना।
— डॉ. अशोक
