नौतपा की अग्नि ज्वाला
नौतपा की अग्नि ज्वाला, धरती को तपाने आई है,
प्रखर हुईं सूरज की किरणें, अम्बर ने आग बरसाई है।
नौतपा की अग्नि ज्वाला, रोहिणी नक्षत्र-संग आई है,
तपती धरा जलता अंबर, व्याकुलता हर ओर छाई है।
नौ दिन तक लगातार, अग्नि बरसती सतत अंबर से,
यह अवधि कहलाती ‘नौतपा, रीति चली है युग-युग से।
आम पकें, जामुन महकें, बेल का शरबत मन को भाए,
पसीना छूटे, हिम्मत टूटे, मटके का ठंडा पानी सुख पहुँचाए।
दिन में आना-जाना मुश्किल, रात भी लाए गर्म हवाएँ,
लेकिन छत पर सोने का सुख, यादें पुरानी ले आएँ।
मई विदा होने को तत्पर, जून खड़ा द्वार पर,
नौ दिनों का कठिन तप अब, भारी है संसार पर।
भीषण गर्मी,तपती लू है, झुलस रही है सबकी काया,
किंतु इसी उत्ताप में देखो, सुख का संदेशा आया।
जितना अधिक तपेगा सूरज, उतनी वर्षा आएगी,
सूखी प्यासी इस धरती की, तृष्णा ये मिटाएगी।
— लीला तिवानी
