कविता- कैसे कहूं?
मन में मेरे कहने को है बहुत कुछ,
कैसे कहूं? कुछ समझ न पाऊं,
मन में रखूं तो मन रूठ जाता है,
बाहर कहूं तो जग को रुठा हुआ पाऊं!
लिखने बैठूं तो सोच में पड़े कलम,
क्या लिखूं, किस विधा में लिखूं,
मन के भावों को सच्चाई से व्यक्त करूं,
या कटु सत्य से किनारा करती दिखूं!
मन है चंचल-चपल, मन ही समझदार भी,
उलझाता है, सुलझाता है, करता खबरदार भी,
किसी को परखे बिना मन के राज मत खोलना,
वरना रह नहीं पाओगे प्यारे खुद के राजदार भी।
— लीला तिवानी
