लघुकथा – इंसानियत
प्रेम का भाव लिए प्रेमी-प्रेमिका अपने मन की बाते कर रहे थे। वे दोनों चाहते थे कि उनका प्रेम अमर हो जिसमें दया, इंसानियत तथा सच्चे भाव हमेशा जिंदा रहे।
प्रेम की बातें दोनों में चल रही थी। प्रेमी अपने प्रेम की सच्चाई को बयां करते हुये कहा कि तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह बना रहेगा। मै तुम्हारे प्रति सदैव एक इंसान की तरह रहूंगा। तुम्हारी प्रत्येक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर सारा काम करूँगा।
दोनों की चल रही बातों के बीच में टोंकते हुए एक बुजुर्ग महिला ने कुछ मदद के लिए पैसे मांगा। बीच में बुजुर्ग महिला के आगमन से प्रेमी आपे से बाहर हो गया। आंखों में गुस्सा लिए बोला–“पैसा पेड़ में थोड़ी फलते हैं जो तुमको दे दूं। चलो हटो “
बुजुर्ग महिला कड़वी बातें सुनकर आगे बढ़ने लगी। प्रेमिका आगे बढ़कर बुजुर्ग महिला को कुछ पैसे देकर मदद की और प्रेमी के किये व्यवहार के लिए क्षमा भी मांगी।
प्रेमिका गुस्से में अपनी प्रेमी पर भड़क गयी। उसने कहा- तुम्हारे अंदर इंसानियत नहीं है। एक बुजुर्ग महिला के प्रति तुम्हारा व्यवहार कटु है। इंसान होने की भावना नही है और हाँ, मेरा प्रेम वहां सदैव के लिए खत्म हो जाता है जहाँ पर इंसानियत न के बराबर हो और मैं अपना प्रेम सदा के लिए तुमसे खत्म करती हूँ”।
इतना कहकर प्रेमिका वहां से चल दी। प्रेमी हतप्रभ होकर बुलाता रहा लेकिन उसके हाथों से आज उसका प्रेम काफी दूर चला गया। प्रेमी को एहसास हुआ कि इंसान के अंदर इंसानियत होना चाहिए नहीं तो उसका प्रिय वस्तु ईश्वर द्वारा छीन लिया जायेगा।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
