कुण्डलिनी छंद
माया में हर जन फँसा, बना हुआ है हीन।
ठगनी उसको ठग रही, और संग में दीन।।
और संग में दीन, कौन लगता ठुकराया।
कहें मित्र यमराज, यही तो बंधन माया।।३१
लालच में इसके फँसे, हो पाते कब दूर।
ज्ञान, ध्यान, विज्ञान, सब होते मजबूर।।
सब होते मजबूर, द्वंद्व का भारी कच-कच।
माया के आधीन, स्वार्थ का होता लालच।।३२
जानें कब हम हो गये, माया के आधीन।
और आज अब हम सभी, बनकर घूमें दीन।।
बनकर घूमें दीन, आज हम खुद ही मानें।
आगे का अब हाल, हमारे ईश्वर जानें।।३३
मँहगाई की मार, रही रो जनता सारी।
सोच रही दिन रात, नई आई बीमारी।।
नई आई बीमारी, व्यर्थ कहना दुखदाई।
कहें मित्र यमराज, नया रिश्ता मँहगाई।।३४
मँहगाई का दौर है, बिकता नहीं अनाज।
हुई किसानी आजकल, बनी कोढ़ में खाज।।
बनी कोढ़ में खाज, व्यर्थ सब लगता भाई।
कहें मित्र यमराज, जान लेगी मँहगाई ।।३५
पावन गंगा नीर है, गाते हम गुणगान।
उससे ज्यादा है हमें, खुद पर अब अभिमान।।
खुद पर अब अभिमान, देखिए सब मनभावन।
कहें मित्र यमराज, मातु मम गंगा पावन।।३६
मँहगाई का दौर है, बिकता नहीं अनाज।
हुई किसानी आजकल, बनी कोढ़ में खाज।।
बनी कोढ़ में खाज, व्यर्थ सब लगता भाई।
कहें मित्र यमराज, जान लेगी मँहगाई ।।३७
अब तो जीवन से बड़ा, भारी हुआ दहेज।
हम सब अपनी बेटियाँ, पाते नहीं सहेज।।
कहें मित्र यमराज, ठाट से बैठो महतो।
लेना खूब दहेज, काम है केवल अब तो।।३८
पैसे का सब खेल है, लेना आप सहेज।
बड़े गर्व से कह रहा, मेरा नाम दहेज।।
मेरा नाम दहेज, दोष दूजे का कैसे।
हमको भी तो यार, सिर्फ दिखते हैं पैसे।।३९
अपने पर भी अब नहीं, रहा मुझे विश्वास।
केवल तुझसे है बची, मेरी अंतिम आस।।
कहें मित्र यमराज, देखते रहना सपने।
बड़े धैर्य के साथ, सोच कितने अब अपने।।४०
मानव जीवन कुछ नहीं, बस केवल अतिरेक।
पद पैसा पहचान का, करते सब अभिषेक।।
करते सब अभिषेक, काम इनका जस दानव।
कहें मित्र यमराज, आज ऐसा क्यों मानव।।४१
हमको इतना है पता, समय बड़ा बलवान।
पर कुंठित हम लोग हैं, पढ़ आये विज्ञान।।
पढ़ आये विज्ञान, आज बीमारी सबको।
इसका सफल इलाज, मित्र बतलाओ हमको।।४२
जमकर हिंसा कीजिए, छोड़ो व्यर्थ विचार।
यही आज का है बड़ा, मानो निज आधार।।
मानो निज आधार, छोड़ सब ये पहले कर।
नाचो-गाओ खूब, संग मस्ती कर जमकर।। ४३
