राजनीति

आत्मनिर्भर भारत का नया अध्याय रुद्रम-2

भारत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह अब केवल सैन्य उपकरणों का आयात करने वाला राष्ट्र नहीं रहा, बल्कि अत्याधुनिक सैन्य तकनीक विकसित करने वाला एक प्रमुख देश बन चुका है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन जिसे हम डीआरडीओ के नाम से जानते हैं और भारतीय वायुसेना के संयुक्त प्रयासों ने देश के रक्षा इतिहास में एक बेहद गौरवशाली पन्ना जोड़ा है। हाल ही में हवा से जमीन पर मार करने वाली देश की सबसे आधुनिक एंटी रेडिएशन मिसाइल रुद्रम-2 का सफल परीक्षण किया गया है। यह परीक्षण ओडिशा के तट पर किया गया जहाँ भारतीय वायुसेना के अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमान सुखोई-30 मार्क(वन) का उपयोग किया गया। परीक्षण पूरी तरह से अपने सभी मानकों पर खरा उतरा। इस दौरान मिसाइल की प्रोपल्शन प्रणाली, नियंत्रण तंत्र और इसकी गाइडेंस तकनीक ने एकदम सटीक तरीके से काम किया और अपने निर्धारित लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेदा। यह सफलता केवल एक हथियार का परीक्षण नहीं है, बल्कि यह देश की सामरिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग है।

वर्तमान समय में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। आज की सैन्य लड़ाइयाँ केवल सैनिकों की संख्या या टैंकों के बल पर नहीं जीती जाती हैं। आज का युद्ध मुख्य रूप से तकनीक, निगरानी क्षमता और रडार नेटवर्क पर निर्भर करता है। जिस देश का रडार नेटवर्क और हवाई रक्षा तंत्र जितना मजबूत होता है, वह युद्ध के मैदान में उतना ही अधिक हावी रहता है। इसी कारण से किसी भी सैन्य संघर्ष में सबसे पहली रणनीति दुश्मन की आंखों और कानों को यानी उसके रडार और संचार प्रणालियों को नष्ट करने की होती है। ऐसी परिस्थिति में रुद्रम-2 जैसी उच्च तकनीक वाली मिसाइलों का महत्व बहुत बढ़ जाता है। इस मिसाइल को विशेष रूप से दुश्मन के रडार, उसके वायु रक्षा तंत्र, संचार नेटवर्क और ऐसी किसी भी प्रणाली को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है जो रेडियो फ्रीक्वेंसी उत्सर्जित करती है।

पारंपरिक मिसाइलें आमतौर पर किसी पूर्व निर्धारित लक्ष्य या स्थान पर हमला करती हैं, लेकिन एक एंटी रेडिएशन मिसाइल का काम करने का तरीका बिल्कुल अलग और बेहद जटिल होता है। यह मिसाइल दुश्मन के रडार या संचार उपकरणों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों को हवा में ही पकड़ लेती है। एक बार जब यह उन तरंगों को पहचान लेती है, तो यह उन्हीं संकेतों का पीछा करते हुए सीधा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि अगर दुश्मन का रडार ऑपरेटर हमले की भनक लगते ही अपना रडार बंद भी कर दे, ताकि मिसाइल को संकेत मिलना बंद हो जाएं, तब भी यह मिसाइल दिशा नहीं भटकती। इसके भीतर एक ऐसी उन्नत प्रणाली लगी है जो रडार के अंतिम सक्रिय स्थान को अपनी मेमोरी में दर्ज कर लेती है और रडार बंद होने के बावजूद उसी स्थान पर जाकर भारी तबाही मचाती है। मिसाइल की यही खूबी इसे दुनिया के सबसे घातक हथियारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है।

रुद्रम-2 की एक और सबसे बड़ी ताकत इसकी मारक क्षमता और गति है। प्राप्त जानकारी के अनुसार यह मिसाइल लगभग 300 किलोमीटर की दूरी से अपने लक्ष्य को भेद सकती है। इसके साथ ही इसकी गति मैक 5.5 तक पहुंच सकती है, जिसका मतलब है कि यह ध्वनि की गति से साढ़े पांच गुना अधिक तेजी से उड़ान भरती है। इतनी अधिक गति के कारण दुश्मन के पास इससे बचने या जवाबी कार्रवाई करने का कोई समय नहीं बचता। 300 किलोमीटर की लंबी रेंज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों को दुश्मन के रडार को नष्ट करने के लिए उसकी सीमा में बहुत अंदर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे सुरक्षित दूरी से ही मिसाइल दागकर दुश्मन के हवाई रक्षा तंत्र को तबाह कर सकते हैं, जिससे हमारे पायलटों और विमानों की सुरक्षा कई गुना सुनिश्चित हो जाती है।

आधुनिक समय में लड़े जा रहे युद्धों में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि किसी भी देश की सुरक्षा के लिए उसका एयर डिफेंस नेटवर्क सबसे अहम होता है। हाल के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में भी यह देखा गया है कि जिस देश का हवाई रक्षा तंत्र सक्रिय रहता है, वहां दुश्मन के विमानों का प्रवेश करना लगभग असंभव हो जाता है। इसलिए वायुसेनाएं एक विशेष रणनीति का पालन करती हैं जिसे एसईएडी कहा जाता है। इसका अर्थ होता है दुश्मन के हवाई रक्षा तंत्र को पूरी तरह से कुचल देना या निष्क्रिय कर देना। रुद्रम-2 को मुख्य रूप से इसी सामरिक कार्य के लिए तैयार किया गया है। युद्ध शुरू होते ही भारतीय वायुसेना सबसे पहले अपने सुखोई-30 मार्क(वन) विमानों के जरिए रुद्रम-2 मिसाइलों की बौछार कर सकती है। जैसे ही दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस नेटवर्क ध्वस्त होंगे, उसके तुरंत बाद भारतीय वायुसेना के राफेल, मिराज-2000 और तेजस जैसे लड़ाकू विमान दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर अपने अन्य सैन्य अभियानों को बिना किसी बाधा के पूरा कर सकेंगे। इस तरह यह मिसाइल भारतीय वायुसेना के लिए एक बहुत बड़े फोर्स मल्टीप्लायर की भूमिका निभाएगी।

तकनीकी दृष्टिकोण से देखा जाए तो रुद्रम-2 में विश्व स्तर की कई अत्याधुनिक प्रणालियों का इस्तेमाल हुआ है। इसमें पैसिव होमिंग हेड सीकर लगा है, जो एक बहुत ही संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक रिसीवर की तरह काम करता है। यह बिना अपनी मौजूदगी बताए दुश्मन के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नलों को खोजता है और उन्हें ट्रैक करता है। नेविगेशन के लिए इस मिसाइल में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के साथ-साथ भारत के पूरी तरह स्वदेशी उपग्रह नेविगेशन नेटवर्क नाविक का उपयोग किया गया है। युद्ध के दौरान दुश्मन अक्सर जीपीएस सिग्नलों को जाम करने का प्रयास करते हैं, लेकिन नाविक प्रणाली के कारण रुद्रम-2 किसी भी बाहरी जीपीएस सिग्नल पर निर्भर नहीं रहती और अपने लक्ष्य तक अचूक निशाना लगाती है। इसके अलावा इसमें लॉन्च से पहले लक्ष्य को लॉक करने और हवा में दागने के बाद भी नए लक्ष्य को लॉक करने जैसी उन्नत तकनीकी सुविधाएं मौजूद हैं, जो पायलट को अंतिम क्षणों में भी रणनीति बदलने का विकल्प देती हैं।

रुद्रम-2 जैसी मिसाइल को सुखोई-30 मार्क(वन) जैसे भारी लड़ाकू विमान के साथ जोड़ना भी अपने आप में एक बहुत बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती रही है। मिसाइल का एरोडायनामिक डिजाइन ऐसा होना चाहिए कि वह मैक 5.5 की प्रचंड गति पर पैदा होने वाले अत्यधिक तापमान और हवा के भारी दबाव को आसानी से सहन कर सके। इस गति पर हवा के घर्षण से मिसाइल की बाहरी परत बहुत अधिक गर्म हो जाती है, इसलिए इसके निर्माण में विशेष प्रकार के मिश्रित पदार्थों और तापरोधी कोटिंग का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसके अंदर लगे संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रखते हैं। इसके अलावा मिसाइल को विमान के मिशन कंप्यूटर के साथ सॉफ्टवेयर के जरिए पूरी तरह से सिंक करना होता है ताकि पायलट कॉकपिट में बैठकर ही मिसाइल की हर गतिविधि को नियंत्रित कर सके।

भारत के लिए इस मिसाइल के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका पूर्ण रूप से स्वदेशी होना है। दशकों तक भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस, फ्रांस, इजरायल और अमेरिका जैसे देशों पर निर्भर रहा है। लेकिन रुद्रम-2 का विकास डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं ने स्वदेशी तकनीक से किया है। इसके उत्पादन चरण में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों के साथ-साथ कई निजी क्षेत्र की कंपनियां भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। वर्तमान में भारतीय वायुसेना रूसी मूल की केएच-31 एंटी रेडिएशन मिसाइल का उपयोग करती है। उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में रुद्रम-2 पूरी तरह से इसकी जगह ले लेगी, जिससे विदेशी निर्भरता समाप्त हो जाएगी। स्वदेशी रक्षा विनिर्माण केवल सेना को मजबूत नहीं करता बल्कि यह देश के भीतर एक विशाल तकनीकी और आर्थिक ढांचा भी तैयार करता है।

सामरिक दृष्टिकोण से रुद्रम-2 का सफल परीक्षण पड़ोसी देशों विशेषकर चीन और पाकिस्तान के लिए एक बहुत कड़ा संदेश है। दोनों देश अपनी सीमाओं पर लगातार अपने हवाई रक्षा तंत्र और रडार प्रणालियों को मजबूत कर रहे हैं। ऐसे में यह मिसाइल भारतीय वायुसेना को उन पर एक बहुत बड़ी सामरिक बढ़त प्रदान करती है। भारतीय सैन्य रणनीति के तहत केवल रुद्रम-2 ही नहीं, बल्कि रुद्रम-1 का विकास भी किया जा चुका है और भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए रुद्रम-3 पर भी तेजी से काम चल रहा है। यह मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक है और यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आने वाले समय में देश विश्व मंच पर एक आत्मनिर्भर और अजेय सैन्य शक्ति के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाए रखेगा।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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